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नवगछिया : देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान के तत्वावधान में 5 अक्टूबर को राष्ट्रीय डॉल्फिन दिवस के अवसर पर बिहार के इस्माइलपुर प्रखंड के फुलकिया गांव में एक विशेष जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य डॉल्फिन संरक्षण के प्रति स्थानीय समुदाय, विशेष रूप से मछुआरा समाज को जागरूक करना और उनकी भागीदारी को प्रोत्साहित करना था।

कार्यक्रम के दौरान जलज परियोजना के सहायक समन्वयक राहुल कुमार राज ने बताया कि डॉल्फिन संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने मार्च 2022 में 5 अक्टूबर को राष्ट्रीय डॉल्फिन दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी। तब से हर वर्ष यह दिन डॉल्फिन के महत्व और उनके संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से मनाया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि बिहार में डॉल्फिन के संरक्षण में मछुआरों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। अक्सर करेंटी जाल में फंसने से डॉल्फिन की मृत्यु हो जाती है। इसे रोकने के लिए मछुआरों को समय-समय पर सतर्क किया जाता है और उन्हें वैकल्पिक आजीविका तथा कौशल विकास का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। जलज परियोजना के माध्यम से भारतीय वन्यजीव संस्थान मछुआरों को नदी संरक्षण से जुड़ी जानकारियाँ और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराता है।

इस मौके पर यह भी बताया गया कि विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य भारत का एकमात्र डॉल्फिन अभयारण्य है, जो बिहार के भागलपुर जिले में सुल्तानगंज से कहलगांव तक गंगा नदी के 60 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। यह क्षेत्र डॉल्फिनों के लिए एक महत्वपूर्ण संरक्षित स्थान है।

कार्यक्रम में डॉल्फिनों पर मंडरा रहे खतरों पर भी प्रकाश डाला गया, जिनमें कम जल प्रवाह, गाद का जमाव, जल प्रदूषण, यंत्रीकृत नौका संचालन, अवैध शिकार और जाल में आकस्मिक फँसना प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त, जलवायु परिवर्तन और नदियों की गहराई में कमी भी डॉल्फिन के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है, क्योंकि उनके प्रजनन और भोजन चक्र के लिए गहरे जल की आवश्यकता होती है।

कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने जैव विविधता और जल जीवन के संरक्षण का संकल्प लिया। साथ ही, राष्ट्रीय जलीय जीवों को लुप्त होने से बचाने के लिए जागरूकता फैलाने की प्रतिबद्धता भी जताई गई। इस अवसर पर लोगों ने संरक्षण संबंधी नारे लगाकर वातावरण को जीवंत बना दिया।

इस कार्यक्रम ने स्थानीय स्तर पर डॉल्फिन संरक्षण को लेकर सकारात्मक संदेश दिया और यह साबित किया कि सामुदायिक सहयोग से ही ऐसे प्रयास सफल हो सकते हैं।

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