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भागलपुर। जिले के कहलगांव स्थित उत्तरवाहिनी गंगा तट पर गुरुवार को भक्ति और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिला। ब्रह्मलीन श्री शांति बाबा की 56वीं पुण्यतिथि के अवसर पर देश-विदेश से हजारों की संख्या में श्रद्धालु कहलगांव के शांति धाम आश्रम पहुंचे। पूरे परिसर में “गंगा मैया की जय” और “शांति बाबा अमर रहें” के जयकारों से वातावरण गूंज उठा।

गंगिया के साधक, तप और त्याग के प्रतीक थे शांति बाबा
सन 1900 में राजस्थान के झुंझुनू में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की मध्यरात्रि को जन्मे वंशीधर, बाद में शांति दास कहलाए, जिन्हें लोग प्रेम से शांति बाबा के नाम से जानते हैं। गया में एक बार पिंडदान के दौरान उनका बैग चोरी हो गया, लेकिन उन्होंने इस घटना को जीवन का मोड़ मानते हुए संसार त्याग दिया। तन पर केवल एक लंगोटी, हाथ में भिक्षापात्र लिए वे असम के कामाख्या मंदिर, बंगाल के मां तारापीठ और बेलूर मठ से होते हुए अंततः कहलगांव की पहाड़ी पर पहुंचे, जहां उन्होंने गहन साधना प्रारंभ की।

वे मां गंगा को ‘गंगिया’ कहकर पुकारते थे और घंटों समाधि में लीन रहते थे। उनका आहार केवल भांग और उबला चना था। 14 नवंबर 1970 को उन्होंने इसी पवित्र भूमि पर देह त्याग दी। उनके आदेशानुसार, उनका शरीर गंगा के किनारे ही समाधि दी गई, जो आज श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है।

रामायण पाठ से आरंभ, गंगा आरती से समापन
पुण्यतिथि के अवसर पर सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लग गया। कार्यक्रम की शुरुआत 24 घंटे के अखंड रामायण पाठ से हुई, जिसका संपादन पंडित विभूति पांडे, नीलेश शुक्ला, गोपाल शुक्ला, संतोष और पुन्यानंद मिश्र ने किया। इसके बाद केदार बाबा (शांति बाबा के प्रमुख पुजारी) द्वारा हवन, ध्वजारोहण, शांति बाबा की आरती और गंगा आरती का आयोजन किया गया।

गंगा तट पर विशाल भंडारा का भी आयोजन हुआ, जिसमें करीब 40 हजार श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। इस बार गंगा का जलस्तर ऊंचा होने के कारण गंगा पार से आने वाले भक्तों के लिए विशेष नावों की व्यवस्था की गई थी।

दीपों और भजनों से झिलमिलाया शांति धाम
संध्या के समय पूरे आश्रम परिसर का दृश्य अद्भुत था। सैकड़ों दीपों की रोशनी में गंगा तट झिलमिला उठा। भक्ति संगीत और भजन संध्या में देशभर से आए कलाकारों ने “गंगिया माई की महिमा” और “शांति बाबा के चरित” पर आधारित भजन प्रस्तुत कर समां बांध दिया।

देश-विदेश से पहुंचे श्रद्धालु
बाबा के शिष्य केदार बाबा 1970 से आश्रम की देखरेख कर रहे हैं। हर वर्ष की तरह इस बार भी नेपाल, सिंगापुर, मलेशिया और अमेरिका से श्रद्धालु पहुंचे। कहा जा सकता है कि कहलगांव की यह पवित्र भूमि आज न केवल बिहार, बल्कि पूरे विश्व के भक्तों की आस्था का केंद्र बन चुकी है।

गंगिया की गोद में आज भी हैं शांति बाबा सजीव
कार्यक्रम का समापन निशा आरती के साथ हुआ। जब गंगा की लहरें दीपों की रोशनी में झिलमिला उठीं, तो वातावरण अलौकिक हो गया। मंत्रोच्चार, भजन और गंगा की लहरों की गूंज के बीच भक्तों ने महसूस किया कि शांति बाबा आज भी गंगिया की हर लहर में सजीव हैं।

इस अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने संकल्प लिया कि वे शांति बाबा के दिखाए मार्ग — सेवा, साधना और सादगी — को अपने जीवन में अपनाएंगे, ताकि समाज में प्रेम, शांति और भक्ति का संदेश निरंतर प्रवाहित होता रहे।

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