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भागलपुर के समाहरणालय स्थित पेंशनर समाज हॉल में आज जल श्रमिकों की समस्याओं, उनके अधिकारों और सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों पर चर्चा करने के लिए एक बड़ा सम्मेलन आयोजित किया गया। यह सम्मेलन पारंपरिक मछुआ समुदाय से जुड़े जल श्रमिकों की समस्याओं पर केंद्रित था और इसका आयोजन जल श्रमिक संघ तथा गंगा मुक्ति आंदोलन द्वारा किया गया था।

इस सम्मेलन का नाम ‘जल श्रमिक सम्मेलन’ रखा गया था, और इसे मछुआ समुदाय के संघर्ष और अधिकारों की लड़ाई से जोड़कर देखा जा रहा है। आमंत्रण पत्र में कहा गया है कि पारंपरिक मछुआ समाज राज्य के अति पिछड़े वर्ग से आता है, जो लंबे समय से अपने हक और अधिकार के लिए संघर्षरत है। जल श्रमिक संघ के अनुसार, आंदोलन की ताकत के बल पर बिहार सरकार ने कुछ कानून और सुविधाएं जरूर दी हैं, लेकिन लालफीताशाही और सैंक्चुरी कानूनों ने मछुआरों की जिंदगी को और भी जटिल बना दिया है।

कई बार इन कानूनों के चलते जल पर निर्भर जीवनयापन करने वाले श्रमिकों को अपने काम में बाधा का सामना करना पड़ता है। सम्मेलन का उद्देश्य इन मुद्दों पर विस्तार से चर्चा करना और समाधान के रास्ते तलाशना है। आयोजकों ने समाज के जागरूक नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जल श्रमिक समुदाय से जुड़े सभी लोगों से इस सम्मेलन में भाग लेने की अपील की है।

गौरतलब है कि गंगा सहित अन्य नदियों पर निर्भर मछुआ समुदाय की समस्याएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। कभी जल प्रदूषण, कभी वन्यजीव सुरक्षा के नाम पर कानून, तो कभी प्रशासनिक अव्यवस्था—इन सभी का खामियाजा मछुआ समुदाय को उठाना पड़ता है। ऐसे में यह सम्मेलन उन आवाजों को एकजुट करने का प्रयास है, जो वर्षों से अनसुनी रही हैं।

सम्मेलन से यह उम्मीद जताई जा रही है कि इससे नीति निर्धारकों तक मछुआ समाज की वास्तविक स्थिति और जरूरतों की गूंज पहुंचेगी। साथ ही सरकार द्वारा बनाई गई योजनाओं की समीक्षा भी होगी कि वे जमीनी स्तर पर कितनी प्रभावी साबित हो रही हैं। इस आयोजन को लेकर जल श्रमिक संघ और गंगा मुक्ति आंदोलन के कार्यकर्ता पूरी तैयारी में जुटे हुए हैं। सम्मेलन को सफल बनाने के लिए कई गांवों और घाट क्षेत्रों में जनसंपर्क अभियान भी चलाया जा रहा है।

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