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भागलपुर : बिहार विधानसभा चुनाव 2025 जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, कहलगांव विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में हलचल और गहराती जा रही है। जिले की यह सीट इस बार सबसे चर्चित और सस्पेंस से भरी मानी जा रही है। जहां आमतौर पर उम्मीदवारों की घोषणाएं बड़े मंचों से होती हैं, वहीं इस बार रणनीति और मंथन गलियों और हवेलियों के भीतर गोपनीय बैठकों में तय किए जा रहे हैं। जातीय समीकरणों की गिनती और सियासी जोड़-तोड़ अब अपने चरम पर पहुंच चुकी है।

कहलगांव सीट पर इस बार बहुकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है। मैदान में एनडीए समर्थित जदयू प्रत्याशी शुभानंद मुकेश, आरजेडी के रजनीश यादव, कांग्रेस के प्रवीण सिंह कुशवाहा, जन सुराज के मंजर आलम और निर्दलीय उम्मीदवार पवन यादव प्रमुख दावेदार हैं।

बुधवार की दोपहर जब शहर की गलियां गर्म धूप में शांत थीं, तभी कहलगांव की एक तंग गली में सियासी हलचल बढ़ गई। बताया जाता है कि यहां ‘दल जी’ और ‘निर्दल जी’ के बीच एक गुप्त मुलाकात हुई। ‘दल जी’ के प्रतिनिधि ‘पिताजी’ मौजूद थे, जबकि ‘निर्दल जी’ खुद पहुंचे थे। दोनों ओर से केवल चुनिंदा विश्वस्त लोग मौजूद थे, लेकिन बातचीत केवल दोनों नेताओं के बीच में हुई। बैठक इतनी गोपनीय थी कि आसपास के लोग भी हैरान रह गए और अटकलों का दौर शुरू हो गया।

अब सवाल उठ रहा है कि यह चाय पर चर्चा थी या चुनावी चाल? सूत्रों के अनुसार यह महज औपचारिक भेंट नहीं थी, बल्कि राजनीतिक समझौते की प्रारंभिक रूपरेखा थी। बातचीत का मुख्य विषय यह बताया जा रहा है कि यदि ‘निर्दल जी’ चुनाव मैदान से पीछे हटते हैं, तो ‘दल जी’ की स्थिति और मजबूत हो सकती है। बदले में उन्हें क्या लाभ मिलेगा, यह स्पष्ट नहीं है, पर राजनीतिक संकेत कई बातें बयां कर रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि निर्दलीय उम्मीदवार पवन यादव का क्षेत्र में मजबूत जनाधार है। यदि वे चुनाव में बने रहते हैं तो वोटों का बंटवारा तय है। वहीं अगर वे किसी समझौते के तहत मैदान छोड़ते हैं, तो मुकाबला दो प्रमुख दलों के बीच सिमट जाएगा और पूरा चुनावी समीकरण बदल जाएगा।

हालांकि इस गोपनीय मुलाकात पर अब तक किसी की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। कुछ लोग इसे शुरुआती वार्ता बता रहे हैं, तो कुछ का दावा है कि सौदा लगभग तय हो चुका है और केवल घोषणा बाकी है।

अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह मुलाकात कहलगांव की सियासत की दिशा बदल देगी? क्या ‘निर्दल जी’ वास्तव में पीछे हटेंगे या यह केवल विरोधियों को भ्रमित करने की रणनीति है?

फिलहाल इतना तो तय है कि कहलगांव की फिज़ा में चुनावी सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं। जातीय गणित साधने, रिश्तों की दुहाई देने और अंतिम क्षणों में समीकरण बदलने की कोशिशें जारी हैं। सियासत की बिसात पर अब हर चाल जीत सुनिश्चित करने के लिए बिछाई जा रही है।

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