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नवगछिया की श्रीरामलीला में हुआ सूर्पणखा नखछेदन और सीता हरण का जीवंत मंचन, दर्शक हुए भावविभोर

नवगछिया। नगर के घाट ठाकुरबाड़ी प्रांगण में आयोजित श्रीरामलीला महोत्सव के पांचवे दिन बुधवार को राम वनगमन, सूर्पणखा नखछेदन और सीता हरण की लीला का मंचन किया गया। उत्तर प्रदेश के काशी वाराणसी विंध्याचल धाम से आए जय मां भवानी श्रीरामलीला मंडल के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत यह दृश्य दर्शकों के लिए अत्यंत भावुक और रोचक रहा। रामायण के इस महत्वपूर्ण प्रसंग को जीवंत रूप में देखकर उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।

लीला की शुरुआत श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के वनगमन से होती है। तीनों भाई-बहन पंचवटी में निवास कर रहे होते हैं, तभी रावण की बहन सूर्पणखा वहां पहुंचती है। सूर्पणखा, श्रीराम पर मोहित होकर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखती है। श्रीराम मुस्कराकर उसे लक्ष्मण के पास भेज देते हैं। जब वह लक्ष्मण के पास पहुंचती है, तो लक्ष्मण भी उसके प्रस्ताव को ठुकराकर पुनः श्रीराम के पास भेज देते हैं।

इस प्रकार बार-बार दोनों भाइयों के द्वारा उपेक्षा किए जाने से सूर्पणखा क्रोधित हो जाती है और अपना राक्षसी रूप प्रकट कर देती है। उसका विकराल रूप देखकर सीता भयभीत हो जाती हैं। तभी श्रीराम के संकेत पर लक्ष्मण अपनी तलवार से सूर्पणखा की नाक काट देते हैं। यह दृश्य बेहद प्रभावशाली और रोमांचकारी था, जिससे दर्शकों के बीच सन्नाटा छा गया।

नाक कटने से अपमानित होकर सूर्पणखा रोती हुई अपने भाई खर-दूषण के पास जाती है। वह उन्हें श्रीराम और लक्ष्मण के बारे में भड़काती है। खर-दूषण अपनी सेना के साथ युद्ध के लिए पहुंचते हैं, लेकिन श्रीराम के हाथों उनका वध हो जाता है।

इसके बाद लीला में सूर्पणखा लंका जाकर रावण को पूरी घटना बताती है। रावण पहले उसे शांत कर महल में भेज देता है, परंतु सूर्पणखा के अपमान का बदला लेने की भावना उसके भीतर पनपने लगती है। वह अपनी योजना को अंजाम देने के लिए मामा मारीच के पास जाता है।

मारीच रावण को समझाने की कोशिश करता है, “राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। वे स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं। उनसे बैर मोल लेना अपने कुल का सर्वनाश करना है।” लेकिन रावण क्रोधित होकर अपनी जिद पर अड़ा रहता है। मारीच अंततः यह समझकर कि अब मृत्यु निश्चित है, भगवान की शरण में जाना ही उचित मानता है। वह एक स्वर्ण मृग का रूप धारण कर पंचवटी पहुंचता है।

सीता उस स्वर्ण मृग को देखकर मोहित हो जाती हैं और श्रीराम से उसे लाने की इच्छा प्रकट करती हैं। श्रीराम मृग का पीछा करते हुए वन में दूर निकल जाते हैं। जैसे ही श्रीराम का बाण मारीच को लगता है, वह “हाय लक्ष्मण” कहकर गिर पड़ता है। उसकी आवाज सुनकर सीता घबरा जाती हैं और लक्ष्मण को राम की सहायता के लिए भेज देती हैं।

लक्ष्मण के जाते ही रावण साधु वेश में भिक्षा मांगने आता है। जैसे ही सीता लक्ष्मण रेखा लांघती हैं, रावण उन्हें बलपूर्वक अपने रथ में बैठाकर हरण कर लेता है। सीता की करूण पुकार सुनकर जटायु रावण का रास्ता रोकते हैं। दोनों के बीच संघर्ष होता है और जटायु रावण को मूर्छित कर देते हैं। लेकिन होश में आने के बाद रावण तलवार से जटायु के पंख काट देता है और सीता को लेकर आकाश मार्ग से लंका की ओर बढ़ जाता है।

आकाश मार्ग से जाते समय एक पर्वत पर बैठे बंदरों को देखकर सीता अपने आभूषणों में से चूड़ामणि उतारकर नीचे फेंक देती हैं, ताकि राम को संकेत मिल सके।

वन में जब राम को लक्ष्मण लौटते दिखते हैं, तो वे अत्यंत चिंतित हो जाते हैं। राम दुःखी होकर कहते हैं, “लक्ष्मण, सीता के बिना यह जीवन व्यर्थ है। इससे बड़ी विपत्ति और क्या हो सकती है?” लक्ष्मण अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि यह सब योजना के अनुसार हुआ, पर उन्हें इसका आभास नहीं था।

इसके बाद मंच पर आरती कर भगवान श्रीराम की वंदना की गई और इस भावनात्मक एवं रोमांचकारी लीला का समापन किया गया। संपूर्ण दृश्य में प्रकाश, ध्वनि और भावाभिनय का ऐसा समन्वय था कि दर्शकों की आंखें नम हो गईं।

यह श्रीरामलीला महोत्सव 5 जुलाई से 13 जुलाई तक प्रतिदिन रात्रि 8 बजे से 11 बजे तक आयोजित किया जा रहा है। यह आयोजन नवगछिया नगरवासियों की ओर से कराया जा रहा है, जिसमें श्रद्धालु बड़ी संख्या में शामिल होकर धर्म लाभ प्राप्त कर रहे हैं।

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