


भागलपुर: गंगा नदी की बाढ़ अब केवल जलस्तर का संकट नहीं, बल्कि आमजन की पीड़ा और बेबसी का जीवंत दृश्य बन चुकी है। शहर से सटे कई इलाकों में पानी इस कदर फैल चुका है कि लोग अपने घर-आंगन छोड़कर ऊँचे स्थानों और सड़कों की शरण में आ गए हैं। बाढ़ पीड़ितों की जिंदगी अब खुले आसमान के नीचे बीत रही है।
कहीं सड़क किनारे टीन की छांव में छोटे-छोटे बच्चों को सुलाया जा रहा है, तो कहीं भीगी लकड़ियों से चूल्हा जलाकर रोटियां सेंकी जा रही हैं। इन महिलाओं की आंखों में एक ही सवाल तैर रहा है – “अब आगे क्या?”
पुरुषों की चिंता अपने मवेशियों को लेकर है, जो उनके जीवन यापन का एकमात्र सहारा थे। न चारा है, न छांव। वे जानवरों को लेकर इधर-उधर भटकते फिर रहे हैं। बच्चों की मासूमियत भी इस त्रासदी की भेंट चढ़ चुकी है – न खेल है, न स्कूल, न किताबें।
हालत यह है कि सड़कों पर जीवन ठहरा हुआ है, और प्रशासन अभी तक केवल आश्वासन की भाषा बोल रहा है। राहत शिविरों की व्यवस्था नहीं, पीने के साफ पानी की सुविधा तक उपलब्ध नहीं है।
हर साल गंगा चढ़ती है, घर बह जाते हैं, लेकिन सरकारी तंत्र की नींद नहीं खुलती। योजनाएं सिर्फ फाइलों में सीमित रह जाती हैं और जनता हर बार प्रकृति और सिस्टम के दोहरे प्रहार को झेलती है।












