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नवगछिया । जिस प्रकार श्रीराम का धाम साकेत, श्रीकृष्ण का धाम गोलोक और भगवान शिव का धाम कैलाश माना जाता है, उसी प्रकार माँ दुर्गा का धाम मणिद्वीप के नाम से विख्यात है। नारायणपुर प्रखंड के भ्रमरपुर स्थित यह दुर्गा मंदिर लगभग चार सौ वर्ष पुराना है और इसे सिद्धपीठ के रूप में श्रद्धालुओं द्वारा पूजित किया जाता है । मा का भक्त नवनीत झा नें बताया कि इस मंदिर की स्थापना अद्वितीय है। मान्यता है कि लगभग एक हजार ज्ञानी-पुरुषों ने गंगा स्नान के उपरांत भीगे वस्त्रों में अंजलि भर गंगा की पवित्र मिट्टी लाकर पिंडी का निर्माण किया और वैदिक तथा तांत्रिक विधियों से उसकी प्राण-प्रतिष्ठा की। तभी से यह स्थान सिद्धपीठ के रूप में स्थापित हो गया।

आज भी यहाँ दुर्गा पूजा पूरी वैदिक एवं तांत्रिक पद्धति से संपन्न होती है। पूजन के बाद प्रतिदिन बलि दी जाती है, तत्पश्चात माँ की भव्य आरती की जाती है। दुर्गा संस्कृत विद्यालय के पूर्व प्राचार्य पंडित शशिकांत झा पूजा-अर्चना का संचालन करते हैं, जबकि अभिमन्यु गोस्वामी मुख्य पुजारी और पंडित धनंजय झा सहायक पुजारी के रूप में पूजा कार्य संपन्न कराते हैं।

आरती और भजन कार्यक्रम का दिव्य स्वरूप

संध्या आरती का दृश्य अत्यंत भव्य और दिव्य होता है, जिसमें प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं। सैकड़ों भक्त नित्य दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। रात 8 बजे से 11 बजे तक भजन-कीर्तन का विशेष कार्यक्रम आयोजित होता है। अनुमानतः पचास से अधिक गांवों के श्रद्धालु प्रतिदिन यहाँ पूजन-अर्चन हेतु पहुँचते हैं। यही इस मंदिर की गरिमा और विशेषता है।

मंदिर का भव्य शिखर और शास्त्रों का अंकन

वृंदावन के प्रसिद्ध शिल्पी जितेंद्र सिंह द्वारा मंदिर का भव्य शिखर निर्मित किया जा रहा है, जिसकी चौड़ाई 1300 वर्गफीट और ऊँचाई 135 फीट होगी। विशेष योजना के तहत सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती ग्रेनाइट पत्थरों पर अंकित कर मंदिर में स्थापित की जाएगी।

पूजा-अनुष्ठान का विस्तृत कार्यक्रम

सनातन परंपरा के अनुसार इस वर्ष की पूजा-विधि का कार्यक्रम इस प्रकार निर्धारित किया गया है—

सोमवार, 29 सितम्बर : अष्टमी का प्रवेश, झींगा बलि का आयोजन।

मंगलवार, 30 सितम्बर : अष्टमी व्रत, डाली चढ़ाने का समय दोपहर 1:30 बजे तक।

बुधवार, 1 अक्टूबर : बलि प्रदान का आयोजन सुबह 10:30 बजे से आरंभ।

गुरुवार, 2 अक्टूबर : प्रतिमा विसर्जन शाम 6:30 बजे सम्पन्न होगा।

मणिद्वीप सिद्धपीठ के इस दुर्गा मंदिर की आस्था और परंपरा न केवल भ्रमरपुर बल्कि आसपास के दर्जनों गांवों को एक सूत्र में बाँधती है। दुर्गा पूजा के दौरान यहाँ का वातावरण भक्तिरस और भव्यता से परिपूर्ण रहता है, जो इसे एक अद्वितीय तीर्थस्थल बनाता है।

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