


भागलपुर। बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर में दिनांक 20 जून 2025 से आयोजित चार दिवसीय 29वीं अनुसंधान परिषद (खरीफ 2025) के दूसरे दिन धान की चार नई किस्मों को अनुसंशित किया गया। इन किस्मों में सबौर कतरनी धान-1, सबौर सांभा धान, सबौर विभूति धान और सबौर श्री सब-1 शामिल हैं।

सबौर कतरनी धान-1 को डॉ. मनकेश और उनकी टीम ने विकसित किया है। यह किस्म उच्च उपज देने वाली है, जिसमें पौधे गिरते नहीं हैं (नॉन लॉजिंग)। इसकी उपज क्षमता पारंपरिक किस्मों की तुलना में डेढ़ गुना अधिक है और यह जल्दी पकने वाली किस्म है। लंबे समय से किसानों द्वारा इसकी मांग की जा रही थी।
दूसरी किस्म सबौर सांभा धान है, जिसे डॉ. प्रकाश और उनकी टीम ने विकसित किया है। यह किस्म मध्यम लंबे दानों वाली है और अधिक उपज देने की क्षमता रखती है। इसे किसान बापटला किस्म के विकल्प के रूप में अपना सकते हैं। यह किस्म 100 एकड़ भूमि पर प्रदर्शन के लिए उपलब्ध कराई जाएगी।

तीसरी किस्म सबौर श्री सब-1 है, जिसे डॉ. श्वेता सिन्हा और टीम द्वारा विकसित किया गया है। यह किस्म सबौर श्री धान का संशोधित रूप है, जिसमें जलभराव प्रतिरोधक जीन डाली गई है। यह किस्म 14 दिनों तक जलभराव झेल सकती है और सामान्य परिस्थिति में इसकी उपज 50 से 55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है।
चौथी किस्म सबौर विभूति धान है, जिसे डॉ. अमरेंद्र कुमार और उनकी टीम ने विकसित किया है। यह किस्म बैक्टीरिया जनित पत्ता झुलसा रोग के प्रति सहनशील है और अधिक उपज देती है। इसे जीन पिरामिडिंग विधि से विकसित किया गया है।
इन सभी किस्मों को अनुसंधान परिषद द्वारा पूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ है और किसानों तक इनका बीज शीघ्र उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। बैठक की अध्यक्षता कर रहे कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने सभी वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को बधाई दी और निर्देश दिया कि इन किस्मों का व्यापक प्रदर्शन किसानों के खेतों में किया जाए तथा इनके ब्रांडिंग और पैकेजिंग की व्यवस्था शीघ्र सुनिश्चित की जाए।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. पी. के. सिंह, कृषि आयुक्त, भारत सरकार ने वैज्ञानिकों को निर्देशित किया कि वे अपनी तकनीकों और किस्मों को जल्द से जल्द किसानों तक पहुंचाएं। उन्होंने खेत स्तर पर बीज उत्पादन को भी बढ़ावा देने की सलाह दी।

डॉ. रबिंद्र पडारिया, संयुक्त सचिव (प्रसार), भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली ने अपने संबोधन में कहा कि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित किस्मों का प्रचार-प्रसार प्रिंट मीडिया, समाचार माध्यमों, रेडियो आदि के ज़रिए किया जाए ताकि अधिक से अधिक किसान लाभान्वित हो सकें।
कार्यक्रम में डॉ. एन. एस. राणा (पूर्व अधिष्ठाता, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं तकनीकी विश्वविद्यालय, मेरठ), डॉ. कमलेश प्रसाद (अधिष्ठाता, एफ एंड एसडब्ल्यू, एसएलआईईटी, लोंगोवाल, पंजाब) और डॉ. जगदीश प्रसाद (पूर्व मुख्य वैज्ञानिक, एनबीएसएसएलयूपी, अकोला, महाराष्ट्र) ने भी विश्वविद्यालय में हो रहे शोध कार्यों पर सुझाव दिए।
आज के कार्यक्रम में टेक्नोलॉजी कंपेंडियम पुस्तक का विमोचन माननीय कुलपति एवं अन्य अतिथियों द्वारा किया गया। प्राकृतिक संसाधन संरक्षण समूह के शोधार्थियों ने अपनी शोध परियोजनाओं की प्रस्तुति दी और परिषद द्वारा उन्हें खरीफ मौसम के लिए आवश्यक सुझाव दिए गए।
आगामी दो दिनों में अन्य शेष शोध समूहों की प्रस्तुतियां होंगी। कार्यक्रम के आयोजनकर्ता एवं निदेशक अनुसंधान डॉ. अनिल कुमार सिंह ने सभी वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए आग्रह किया कि वे भविष्य में किसानों के लिए और भी उपयोगी वैज्ञानिक तकनीकें विकसित करें।
फोटो: बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर में आयोजित 29वीं अनुसंधान परिषद की बैठक के दूसरे दिन चार नए धान के प्रभेद अनुसंशित किए गए।












