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श्रीनगर (उत्तराखंड) : हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार केंद्र में पॉश (कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम, प्रतिषेध और निवारण) अधिनियम को लेकर विवाद का मामला सामने आया है। केंद्र में कार्यरत एक सहायक प्राध्यापक द्वारा अपने ही विभाग की एक सह-प्राध्यापक के खिलाफ पॉश अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज कराए जाने के बाद विश्वविद्यालय में इस प्रकरण को लेकर चर्चा तेज हो गई है। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि पॉश अधिनियम का इस्तेमाल उन्हें प्रताड़ित करने के लिए किया जा रहा है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, केंद्र की सह-प्राध्यापक डॉ. अमिता ने पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. सुधांशु जायसवाल पर लंबे समय से मानसिक उत्पीड़न और अभद्र व्यवहार के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि विभागाध्यक्ष द्वारा उनका पीछा करना, अभद्र भाषा का प्रयोग करना, कार्य में असहयोग करना और मानसिक दबाव बनाना जैसी घटनाएं लगातार होती रहीं।

डॉ. अमिता ने 24 दिसंबर 2024 को इस संबंध में लिखित आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका आरोप है कि इसके बावजूद स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि कुलपति से अवकाश स्वीकृत होने के बावजूद विभागाध्यक्ष ने वेतन पत्रक में उन्हें बिना सूचना अनुपस्थित दर्शाते हुए वेतन में कटौती कर दी।

इस मामले में उन्होंने पहली शिकायत 7 अप्रैल 2025 को तत्कालीन प्रभारी कुलपति प्रो. एम. एम. एस. रौथान को दी। कार्रवाई न होने पर 25 अप्रैल को स्मरण पत्र भेजा गया। इसके बाद 30 अप्रैल को उन्होंने विश्वविद्यालय की आंतरिक शिकायत समिति को ई-मेल के माध्यम से मामले से अवगत कराया।

बताया जाता है कि 26 मई को आंतरिक शिकायत समिति में सुनवाई के लिए बुलाए जाने पर समिति के पास मूल शिकायत की जानकारी ही उपलब्ध नहीं थी। आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने शिकायत को आगे नहीं बढ़ाया और न ही समिति ने इसकी जानकारी लेने का प्रयास किया। पीड़ित पक्ष का कहना है कि छह महीने बीत जाने के बावजूद मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

इस बीच मामला राष्ट्रीय महिला आयोग और मानवाधिकार आयोग तक पहुंचा, जहां से कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए। इसके बावजूद पॉश अधिनियम के तहत अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाया जा रहा है।

इसी दौरान विभाग में कार्यरत एक कैमरा कर्मी के साथ कथित दुर्व्यवहार की घटना भी सामने आई। आरोप है कि इस घटना को लेकर भी विवाद बढ़ा और बाद में संबंधित पक्षों द्वारा माफी भी मांगी गई।

मामले में नया मोड़ 19 दिसंबर 2025 को आया, जब विश्वविद्यालय की आंतरिक शिकायत समिति की अध्यक्ष प्रो. मोनिका गुप्ता ने डॉ. अमिता को नोटिस भेजा। नोटिस में सहायक प्राध्यापक डॉ. हर्षवर्धिनी शर्मा की शिकायत का उल्लेख था, जिसमें आरोप लगाया गया कि डॉ. अमिता ने उनके स्वास्थ्य और गर्भावस्था से जुड़ी जानकारी विद्यार्थियों के बीच साझा की।

डॉ. अमिता ने इस आरोप को निराधार बताया है। उनका कहना है कि यह शिकायत पॉश अधिनियम के दायरे में नहीं आती और इसे उनके खिलाफ दबाव बनाने के उद्देश्य से दर्ज कराया गया है।

इस पूरे मामले को लेकर शिक्षाविदों और सामाजिक संगठनों में भी चर्चा तेज हो गई है। कुछ संगठनों ने इसकी शिकायत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, महिला आयोग और मानवाधिकार आयोग से की है। साथ ही स्थानीय स्तर पर भी मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई जा रही है।

विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि आरोप गंभीर हैं तो निष्पक्ष जांच और समयबद्ध कार्रवाई आवश्यक है, ताकि विश्वविद्यालय के शैक्षणिक वातावरण और संस्थागत विश्वसनीयता पर आंच न आए। मामले का दूसरा पक्ष सामने आने पर उसे शामिल किया जाएगा।

एसोसिएट प्रोफेसर ने लगाया उत्पीड़न का आरोप

श्रीनगर (उत्तराखंड) : हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार केंद्र में पॉश (कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम, प्रतिषेध और निवारण) अधिनियम को लेकर विवाद का मामला सामने आया है। केंद्र में कार्यरत एक सहायक प्राध्यापक द्वारा अपने ही विभाग की एक सह-प्राध्यापक के खिलाफ पॉश अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज कराए जाने के बाद विश्वविद्यालय में इस प्रकरण को लेकर चर्चा तेज हो गई है। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि पॉश अधिनियम का इस्तेमाल उन्हें प्रताड़ित करने के लिए किया जा रहा है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, केंद्र की सह-प्राध्यापक डॉ. अमिता ने पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. सुधांशु जायसवाल पर लंबे समय से मानसिक उत्पीड़न और अभद्र व्यवहार के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि विभागाध्यक्ष द्वारा उनका पीछा करना, अभद्र भाषा का प्रयोग करना, कार्य में असहयोग करना और मानसिक दबाव बनाना जैसी घटनाएं लगातार होती रहीं।

डॉ. अमिता ने 24 दिसंबर 2024 को इस संबंध में लिखित आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका आरोप है कि इसके बावजूद स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि कुलपति से अवकाश स्वीकृत होने के बावजूद विभागाध्यक्ष ने वेतन पत्रक में उन्हें बिना सूचना अनुपस्थित दर्शाते हुए वेतन में कटौती कर दी।

इस मामले में उन्होंने पहली शिकायत 7 अप्रैल 2025 को तत्कालीन प्रभारी कुलपति प्रो. एम. एम. एस. रौथान को दी। कार्रवाई न होने पर 25 अप्रैल को स्मरण पत्र भेजा गया। इसके बाद 30 अप्रैल को उन्होंने विश्वविद्यालय की आंतरिक शिकायत समिति को ई-मेल के माध्यम से मामले से अवगत कराया।

बताया जाता है कि 26 मई को आंतरिक शिकायत समिति में सुनवाई के लिए बुलाए जाने पर समिति के पास मूल शिकायत की जानकारी ही उपलब्ध नहीं थी। आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने शिकायत को आगे नहीं बढ़ाया और न ही समिति ने इसकी जानकारी लेने का प्रयास किया। पीड़ित पक्ष का कहना है कि छह महीने बीत जाने के बावजूद मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

इस बीच मामला राष्ट्रीय महिला आयोग और मानवाधिकार आयोग तक पहुंचा, जहां से कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए। इसके बावजूद पॉश अधिनियम के तहत अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाया जा रहा है।

इसी दौरान विभाग में कार्यरत एक कैमरा कर्मी के साथ कथित दुर्व्यवहार की घटना भी सामने आई। आरोप है कि इस घटना को लेकर भी विवाद बढ़ा और बाद में संबंधित पक्षों द्वारा माफी भी मांगी गई।

मामले में नया मोड़ 19 दिसंबर 2025 को आया, जब विश्वविद्यालय की आंतरिक शिकायत समिति की अध्यक्ष प्रो. मोनिका गुप्ता ने डॉ. अमिता को नोटिस भेजा। नोटिस में सहायक प्राध्यापक डॉ. हर्षवर्धिनी शर्मा की शिकायत का उल्लेख था, जिसमें आरोप लगाया गया कि डॉ. अमिता ने उनके स्वास्थ्य और गर्भावस्था से जुड़ी जानकारी विद्यार्थियों के बीच साझा की।

डॉ. अमिता ने इस आरोप को निराधार बताया है। उनका कहना है कि यह शिकायत पॉश अधिनियम के दायरे में नहीं आती और इसे उनके खिलाफ दबाव बनाने के उद्देश्य से दर्ज कराया गया है।

इस पूरे मामले को लेकर शिक्षाविदों और सामाजिक संगठनों में भी चर्चा तेज हो गई है। कुछ संगठनों ने इसकी शिकायत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, महिला आयोग और मानवाधिकार आयोग से की है। साथ ही स्थानीय स्तर पर भी मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई जा रही है।

विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि आरोप गंभीर हैं तो निष्पक्ष जांच और समयबद्ध कार्रवाई आवश्यक है, ताकि विश्वविद्यालय के शैक्षणिक वातावरण और संस्थागत विश्वसनीयता पर आंच न आए। मामले का दूसरा पक्ष सामने आने पर उसे शामिल किया जाएगा।

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