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भागलपुर । जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन के प्रयास से पुरातात्विक महत्व की कई अमूल्य वस्तुओं को भागलपुर संग्रहालय में सुरक्षित किया गया है। ये सामग्रियाँ कला एवं संस्कृति विभाग, बिहार द्वारा संरक्षित घोषित क्षेत्रों में से एक बिहपुर प्रखंड अंतर्गत गुआरिडीह पुरातात्विक स्थल से प्राप्त हुई थीं, जिन्हें जयरामपुर निवासी अविनास चौधरी द्वारा कई वर्षों से अपने मुर्गी फार्म में संग्रहित कर रखा गया था।

प्राप्त पुरातात्विक सामग्रियों में अधिकांश टेराकोटा की वस्तुएँ शामिल हैं। इनमें पत्थर के जाँता का एक भाग, सिलबट्टा और लोढ़ी, नाद, मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े, रेड-ब्लैक वेयर, तांबे के तीन पंच मार्क सिक्के, जानवरों की हड्डियाँ, कंचे, मिट्टी के खिलौने, कच्ची मिट्टी के चूल्हे का हिस्सा तथा पॉलिश्ड ब्लैक वेयर के टुकड़े शामिल हैं। कुल 1033 टुकड़ों में 38 प्रकार की पुरातात्विक सामग्रियाँ जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी को प्राप्त हुईं।

बताया गया कि गुआरिडीह पुरातात्विक स्थल के निरीक्षण के दौरान डीएसीओ अंकित रंजन को जानकारी मिली कि जयरामपुर निवासी अविनास चौधरी के पास वर्षों से गुआरिडीह से प्राप्त कई पुरातात्विक सामग्रियाँ संग्रहित हैं। इसके बाद उन्होंने चौधरी से संपर्क कर इन सामग्रियों को संग्रहालय में जमा कराने का अनुरोध किया। अविनास चौधरी द्वारा पहले सभी सामग्रियों का विधिवत दस्तावेजीकरण किया गया और फिर बुधवार को उन्हें भागलपुर संग्रहालय को सौंप दिया गया।

इस अवसर पर जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन ने कहा कि ये सभी सामग्रियाँ अमूल्य धरोहर हैं और प्राचीन अंग प्रदेश के इतिहास को दर्शाती हैं। संग्रहालय में सुरक्षित रखने से भविष्य में दर्शक और शोधार्थी अपने इतिहास को बेहतर ढंग से जान और समझ सकेंगे। उन्होंने यह भी बताया कि मुर्गी फार्म में लंबे समय तक रखे जाने के कारण कई सामग्रियाँ धीरे-धीरे नष्ट हो रही थीं और चोरी का भी खतरा बना हुआ था। उन्होंने आम लोगों से अपील की कि यदि किसी के पास इस प्रकार की कोई पुरातात्विक सामग्री हो तो तुरंत जिला समाहर्ता को सूचित करते हुए उसे संग्रहालय में जमा कराएँ।

प्रारंभिक आकलन के अनुसार प्राप्त सामग्रियाँ ताम्र-पाषाण युग से लेकर पाल काल की हो सकती हैं। विशेषज्ञों की समीक्षा के उपरांत इन्हें भागलपुर संग्रहालय में संरक्षित एवं प्रदर्शित किया जाएगा।

संग्रहकर्ता और स्थानीय निवासी अविनास चौधरी ने बताया कि वे वर्षों से संरक्षित क्षेत्र के कटाव स्थलों पर जाते रहे हैं, जहाँ से इस प्रकार की सामग्रियाँ मिलती थीं। वे उन्हें अपने मुर्गी फार्म में सुरक्षित रखते चले गए। पहले गाँव और परिवार के लोग उन्हें पागल समझते थे, लेकिन आज दूर-दूर से लोग इन सामग्रियों को देखने आते हैं। उन्होंने कहा कि भले ही ये टूटे-फूटे मिट्टी के बर्तन हों, लेकिन इनके नष्ट होने और चोरी का डर हमेशा बना रहता था। अब जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी के प्रयास से उनकी वर्षों की मेहनत संग्रहालय में सुरक्षित हो गई है।

इस मौके पर जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन, अविनास चौधरी, टीएमबीयू के शोधार्थी आयशा, आनंद, रोजी, रितेश और फैसल सहित कई स्थानीय निवासी उपस्थित थे।

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