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कोसी से गांव की रक्षा का प्रतीक बने हैं बाबा

नवगछिया प्रखंड के नगरह पंचायत में वर्षों की परंपरा के अनुसार इस वर्ष भी बाबा राजा हरदौल का वार्षिक पूजन सम्मेलन पूरे श्रद्धा और भव्यता के साथ आयोजित किया गया। नगरह के उत्तर-पश्चिम दिशा में कोसी नदी के तट पर स्थित बाबा हरदौल गांव के रक्षक के रूप में पूजे जाते हैं। मान्यता है कि बाबा हरदौल रथ पर सवार होकर किल्ला और बहीयार क्षेत्रों का भ्रमण करते हैं और अपनी दिव्य शक्ति से कोसी नदी की आपदा से गांव की रक्षा करते हैं।

जिस प्रकार भगवान शिव ने गंगा की धारा को पृथ्वी पर लाने के लिए अपनी जटाओं में बांधकर नियंत्रित किया था, उसी तरह बाबा हरदौल कोसी की विनाशकारी लहरों को गांव से दूर रखते आए हैं। यही कारण है कि कोसी अब तक नगरह के किल्ला और बहीयार को छू नहीं पाई है।

इस वर्ष भी आषाढ़ पूर्णिमा से पूर्व, आषाढ़ नवरात्र की दशमी तिथि को यानी 5 जुलाई से बाबा का पूजन महोत्सव और अखंड रामधुनी का आयोजन आरंभ हुआ, जिसका समापन एकादशी तिथि को संध्या समय ग्राम के समस्त ब्राह्मणों के खीर-भोजन एवं प्रसाद वितरण के साथ किया जाएगा।

बाबा हरदौल की प्रचलित कथा:

करीब 400 वर्ष पूर्व की यह कथा बुंदेलखंड (ओरछा) के दीवान हरदौल, उनकी बहन कुंजाबाई और भाभी चंपावती से जुड़ी है। हरदौल राजा वीर सिंह देव के पुत्र थे, जिन्होंने अपने बड़े पुत्र जुझार सिंह को राजा और हरदौल को दीवान बनाया। हरदौल अपनी कर्मठता और ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध थे।

कहा जाता है कि रानी चंपावती और हरदौल पर झूठा आरोप लगाकर जुझार सिंह को भड़काया गया। रानी को हरदौल को विष देने का आदेश दिया गया, लेकिन भाभी को संकट से बचाने के लिए हरदौल ने स्वयं ही विषपान कर प्राण त्याग दिए।

इसके बाद एक चमत्कार तब देखने को मिला जब बहन कुंजाबाई ने अपनी बेटी की शादी में हरदौल को भात (विवाह भोज) देने के लिए आमंत्रित किया। समाधि पर रोती बहन की पुकार सुनकर हरदौल प्रकट हुए और अदृश्य रूप में अपनी भांजी की शादी में भात लेकर पहुंचे। तभी से हर विवाह, यज्ञ या धार्मिक आयोजन में बाबा हरदौल को पहले निमंत्रण देने की परंपरा बन गई, जो आज भी कायम है।

नगरह पंचायत स्थित बाबा हरदौल चबूतरा भी इसी आस्था का प्रतीक है। यहां के ग्रामीण शादी-ब्याह, यज्ञ-पूजन या किसी भी धार्मिक आयोजन की शुरुआत बाबा हरदौल को आमंत्रण देने से करते हैं। ऐसा विश्वास है कि बाबा का आशीर्वाद मिलने पर कोई आयोजन अधूरा नहीं रहता।

यह वार्षिक आयोजन सामाजिक आस्था, लोक संस्कृति और क्षेत्रीय एकता का जीवंत उदाहरण है, जिसमें दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं और बाबा हरदौल की जयकारों के साथ पूजन करते हैं।

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