



भागलपुर। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर में “राज्य सार्वजनिक विश्वविद्यालयों को वैश्विक मानकों तक उठाने, शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण और प्रतिभा पलायन की जगह प्रतिभा वापसी” विषय पर एक उच्चस्तरीय मंथन सत्र आयोजित किया गया। इस सत्र में प्रोफेसर सुनील परीक (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फूड टेक्नोलॉजी एंटरप्रेन्योरशिप एंड मैनेजमेंट – NIFTEM) ने ज्ञानवर्धक वक्तव्य दिया।
अपने संबोधन में प्रो. परीक ने भारत में ब्रेन ड्रेन यानी प्रतिभा पलायन की गंभीर समस्या पर प्रकाश डाला, विशेषकर अकादमिक, अनुसंधान और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्रों में। उन्होंने बताया कि भारत विश्व में सबसे अधिक STEM स्नातक तैयार करता है, फिर भी वैश्विक पेटेंट में इसकी हिस्सेदारी 0.5% से भी कम है। पिछले पांच वर्षों में विदेशों में उच्च शिक्षा के लिए जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या दोगुनी हो चुकी है, जिनमें से 75% से अधिक छात्र भारत लौट कर नहीं आते।
प्रो. परीक ने बताया कि ब्रेन ड्रेन से भारत को हर वर्ष लगभग 17 बिलियन डॉलर का नुकसान होता है। यदि केवल 1% प्रतिभा भी लौटे, तो GDP में सालाना दो बिलियन डॉलर की वृद्धि संभव है। उन्होंने चीन के “थाउज़ेंड टैलेंट्स प्रोग्राम” जैसे अंतरराष्ट्रीय मॉडलों का हवाला देते हुए भारत में भी इस तरह की योजनाओं को लागू करने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने भारत की प्रतिभा रणनीति का SWOT विश्लेषण करने की सिफारिश की और R\&D में निवेश को GDP के 2% तक बढ़ाने की बात कही। साथ ही GIAN, VAJRA और अटल इनोवेशन मिशन के तहत अंतर्राष्ट्रीय शोध सहयोग और छात्र आदान-प्रदान की योजनाओं को सशक्त बनाने का सुझाव दिया।

इस सत्र की अध्यक्षता बिहार कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने की। उन्होंने अपने विचार में कहा कि छात्र-प्रतिधारण, पारदर्शी प्रशासन, अनुसंधान की स्वायत्तता और शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण को बढ़ावा देना जरूरी है। उन्होंने यह लक्ष्य रखा कि 2047 तक किसानों की वार्षिक आय ₹10–12 लाख तक पहुँचे और विश्वविद्यालय की वैश्विक रैंकिंग में सुधार हो।
डॉ. सिंह ने कहा, “हमारा मिशन है कि BAU सबौर को एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त संस्थान बनाया जाए, जहाँ साझेदारी, शोध की स्वतंत्रता और छात्रों एवं किसानों को समान रूप से सशक्त किया जा सके। शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ प्रतिभा को रोकना ही नहीं, बल्कि उसे वापस लाना भी होना चाहिए।”
इस कार्यक्रम में अनुसंधान निदेशक डॉ. ए. के. सिंह, डीन डॉ. एस. के. पाठक, विभिन्न विभागों के अध्यक्ष, संकाय सदस्य और शोधकर्ता बड़ी संख्या में उपस्थित थे। यह व्याख्यान भारत की नई शिक्षा नीति (NEP 2020) को वैश्विक मानकों से जोड़ने की दिशा में एक विचारोत्तेजक पहल बना।













