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भागलपुर के कला केंद्र में शुक्रवार को पीस सेंटर परिधि के तत्वावधान में क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले की जयंती समारोहपूर्वक मनाई गई। कार्यक्रम का संचालन राहुल ने किया। इस अवसर पर वक्ताओं ने सावित्रीबाई फुले के सामाजिक, शैक्षणिक और वैचारिक योगदान को याद करते हुए उन्हें आधुनिक भारत की नींव रखने वाली महान समाज सुधारक बताया।

संचालन करते हुए राहुल ने कहा कि सावित्रीबाई फुले ने समाज की आधी आबादी—महिलाओं—के अधिकार, शिक्षा और सम्मान के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व, जब छुआछूत, अमीरी-गरीबी का भेद और धर्मांधता समाज की बुनियाद बने हुए थे, उस दौर में उन्होंने महिला शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक-धार्मिक एकता के लिए क्रांतिकारी कार्य किए। उन्होंने कर्मकांड और गैर-बराबरी के खिलाफ समाज को झकझोर दिया। उन्होंने ज्योतिबा फुले की प्रेरणा से शिक्षा प्राप्त कर देश की पहली महिला शिक्षिका बनने के साथ वर्ष 1848 में भारत का पहला बालिका विद्यालय स्थापित किया।

पूर्व शिक्षक मनोहर शर्मा ने कहा कि इतिहास गवाह है कि जिसने भी धर्मांधता के खिलाफ विज्ञान, तर्क और बराबरी की बात की, उसे प्रताड़ना झेलनी पड़ी। जैसे ब्रूनो को सत्य बोलने के लिए मौत की सजा दी गई थी, उसी तरह सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले को भी सामाजिक तिरस्कार सहना पड़ा। उन्होंने कहा कि आज भी विज्ञान और धर्मांधता के बीच संघर्ष जारी है और समाज में व्याप्त गैर-बराबरी को वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर समाप्त किए बिना उन्नत और खुशहाल समाज की कल्पना संभव नहीं है।

उज्जवल कुमार घोष ने कहा कि हर कालखंड में समाज को दिशा दिखाने के लिए कोई न कोई ध्रुवतारा उभरता है और सावित्रीबाई फुले ऐसी ही ध्रुवतारा थीं। उन्होंने छुआछूत, भेदभाव और धार्मिक कुप्रथाओं के खिलाफ न केवल आवाज उठाई बल्कि अपने जीवन से संघर्ष और बलिदान का उदाहरण प्रस्तुत किया।

मिंटू कलाकार ने उस दौर की सामाजिक परिस्थितियों को रेखांकित करते हुए कहा कि बाल विवाह व्यापक था, जिसके कारण विधवाओं की संख्या अधिक थी और उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था। सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले ने विधवाओं के लिए आश्रम बनवाए, विधवा विवाह को प्रोत्साहित किया और बाल विवाह का विरोध किया। उनके सामाजिक सुधारों के कारण परिवार को भी भारी सामाजिक दबाव झेलना पड़ा और उन्हें घर से निकाल दिया गया। ऐसे कठिन समय में उस्मान शेख और उनकी बहन फातिमा शेख ने सावित्रीबाई फुले के बालिका शिक्षा अभियान में सहयोग किया।

स्मिता ने कहा कि आज भले ही समाज ने तरक्की की हो, लेकिन नफरत का बीज बोने वाली ताकतें आज भी सक्रिय हैं और इसका सबसे अधिक असर महिलाओं पर पड़ता है। नफरत चाहे धार्मिक हो या जातीय, उसका दंश महिलाओं को ही झेलना पड़ता है। सावित्रीबाई फुले ने बराबरी और सम्मानपूर्ण समाज के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित किया।

कार्यक्रम में सावित्रीबाई फुले की प्रसिद्ध कविता “मन्नत” का पाठ भी किया गया, जिसमें यह संदेश दिया गया कि “अगर पत्थर बच्चे देते हैं, करते हैं जब मन्नत पूरी, तो फिर नर-नारी के लिए शादी क्यों है जरूरी।”

संतोष कुमार ने कहा कि आज भी अंधविश्वास और धर्म के नाम पर संसाधनों पर कब्जा करने की कोशिशें जारी हैं और इसमें सबसे अधिक महिलाएं ही प्रभावित हो रही हैं। ऐसे समय में सावित्रीबाई फुले के संघर्ष को याद करना और उससे सीख लेना बेहद जरूरी है।

कार्यक्रम में मो. इम्तियाज हक, मृदुला सिंह, अनंत कुमार सिंह, सौरभ कुमार पासवान, गोपाल यादव, मिथिलेश आनंद, सुनीता देवी, कृषिका गुप्ता, तमन्ना राठौर, अभिजीत, मनोज कुमार सहित कई सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक उपस्थित रहे।

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