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नवगछिया। रेलवे एवं स्थानीय प्रशासन द्वारा चलाए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान जहां एक ओर अवैध कब्जों को हटाने की कार्रवाई जारी थी, वहीं दूसरी ओर कई स्थानों पर मानवीय पीड़ा से जुड़े हृदय विदारक दृश्य भी देखने को मिले। वर्षों से बसे आशियानों के टूटने का दर्द लोगों के चेहरों पर साफ झलक रहा था।

अभियान के दौरान एक स्थान पर उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब एक महिला अचानक अपनी झोपड़ी के भीतर जाकर लेट गई और कार्रवाई रोकने का प्रयास करने लगी। महिला अपने परिजनों के साथ वर्षों से वहीं रह रही थी। उसका कहना था कि उसने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई और मेहनत से यह झोपड़ी खड़ी की थी और अचानक उसे उजाड़ दिया जा रहा है। वह जोर-जोर से चिल्लाती रही कि वह वर्षों से यहां रह रही है और अब ठंड के इस मौसम में वह कहां जाएगी। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस प्रशासन ने परिजनों के सहयोग से महिला को झोपड़ी से बाहर निकाला, लेकिन वह काफी देर तक विलाप करती रही।

वहीं एक अन्य स्थान पर एक और मार्मिक दृश्य सामने आया, जहां एक महिला अपने टूटते आशियाने को चुपचाप खड़ी होकर देखती रही। जेसीबी मशीन द्वारा जब उसका मकान तोड़ा जा रहा था, तब उसकी आंखों से आंसुओं की धारा थमने का नाम नहीं ले रही थी। बिना कुछ कहे, वह बस अपने वर्षों की मेहनत से बनाए गए घर को मिट्टी में मिलते हुए देखती रही। उसके चेहरे पर बेबसी और पीड़ा साफ झलक रही थी।

अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान कई ऐसे स्थल भी सामने आए, जहां लोग अपने उजड़ते आशियानों को देखकर मौन खड़े रहे। न कोई विरोध, न कोई शोर—बस टूटते घरों को देखते हुए आंखों में समाया दर्द।

कुछ लोग अपने बिखरे सामान को समेटने में लगे थे, तो कुछ बस खाली निगाहों से जेसीबी की ओर देखते रहे।

इन दृश्यों ने यह स्पष्ट कर दिया कि अतिक्रमण हटाने की प्रशासनिक कार्रवाई के बीच मानवीय संवेदनाएं भी गहराई से जुड़ी होती हैं। जहां एक ओर नियमों का पालन आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर उजड़ते परिवारों की पीड़ा ने पूरे अभियान को भावनात्मक रूप से झकझोर कर रख दिया।

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