


भागलपुर। अंग क्षेत्र की पहचान बन चुकी मधुर और आत्मीय आवाज के धनी, आकाशवाणी भागलपुर के अवकाश प्राप्त उद्घोषक डॉ. विजय कुमार मिश्रा उर्फ बिरजू भैया के निधन से पूरा अंग प्रदेश शोकाकुल है। उनके निधन की खबर मिलते ही श्रोताओं, कलाकारों और सांस्कृतिक जगत से जुड़े लोगों ने भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इसी कड़ी में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लीफ आर्टिस्ट मधुरेंद्र कुमार ने उन्हें अपनी कला के माध्यम से अनोखे अंदाज में श्रद्धांजलि दी।
विश्वविख्यात लीफ आर्टिस्ट मधुरेंद्र कुमार ने करीब पांच घंटे के कठिन परिश्रम से पीपल के हरे पत्ते पर दिवंगत उद्घोषक विजय कुमार मिश्रा की बेहद सूक्ष्म और आकर्षक तस्वीर उकेरी। इस कलाकृति पर उन्होंने भावपूर्ण शब्दों में लिखा — “हेलो फरमाइश, अलविदा बिरजू भैया।” कलाकार की इस अनूठी श्रद्धांजलि ने लोगों को भावुक कर दिया और सोशल मीडिया पर भी इसे काफी सराहना मिल रही है।
मधुरेंद्र कुमार ने बताया कि बिरजू भैया की आवाज से उनका जुड़ाव बचपन से रहा है। उन्होंने कहा कि जब वे रेडियो पर उनकी आवाज सुना करते थे, तब यह कल्पना भी नहीं की थी कि कभी उनसे आमने-सामने मुलाकात होगी। उन्होंने स्मृतियों को साझा करते हुए बताया कि अंग प्रदेश के दानवीर राजा कर्ण के इतिहास को युवाओं तक पहुंचाने के उद्देश्य से उन्होंने भागलपुर के नाथनगर स्थित कर्णगढ़ परिसर में 20 टन बालू पर भगवान इंद्र को कवच-कुंडल दान करते सूर्यपुत्र कर्ण की विशाल आकृति बनाई थी। इसके बाद 27 फरवरी 2025 को सैंडिस कंपाउंड में आयोजित अंगिका महोत्सव के दौरान मुक्ताकाश मंच से जब बिरजू भैया की आवाज सुनी, तो वे भावुक हो उठे। बाद में उनसे मुलाकात भी हुई, जहां उन्होंने कलाकार की कलाकृति की सराहना की थी।
उन्होंने कहा कि बिरजू भैया की आवाज में अपनापन, स्नेह और आत्मीयता की ऐसी मिठास थी, जिसे भुला पाना संभव नहीं है। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज की गूंज अंगिका माटी में हमेशा सुनाई देती रहेगी।
बताया जाता है कि बिरजू भैया के नाम से लोकप्रिय विजय कुमार मिश्रा ने अपनी विशिष्ट शैली, मधुर वाणी और अंगिका भाषा की आत्मीय अभिव्यक्ति से जन-जन के दिलों में खास स्थान बनाया था। उनका चर्चित रेडियो कार्यक्रम “हेलो फरमाइश” श्रोताओं के बीच बेहद लोकप्रिय रहा और यह केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि लोगों की भावनाओं से जुड़ा सांस्कृतिक सेतु बन गया था।
उनके निधन को अंग समाज ने अपनी सांस्कृतिक पहचान की एक बड़ी क्षति बताया है। लोगों का कहना है कि उनकी अमर आवाज और यादें आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करती रहेंगी।














