



सुल्तानगंज। श्रावणी मेले की पावन कांवड़ यात्रा हमेशा से भक्ति, आस्था और संकल्प का प्रतीक रही है। इस बार सुल्तानगंज से देवघर के पवित्र कांवड़िया पथ पर जो दृश्य सामने आया, उसने भक्ति की परंपरा को एक नया रूप दे दिया। हज़ारों श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच एक ऐसा कांवड़िया दिखा, जिसने भक्ति और प्रायश्चित को एक नई ऊंचाई दी।
यह दृश्य था एक ऐसे श्रद्धालु का, जो कैदी की तरह लोहे की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। सिर झुका हुआ, शरीर पर भगवा वस्त्र, और दोनों हाथ, पैर, कमर व गर्दन तक भारी जंजीरों में बंधा हुआ। देखने में कोई अपराधी जैसा प्रतीत हो रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर गहरी भक्ति की आभा और आंखों में परम शांत संतोष था।

इस अनोखे भक्त का नाम है शंभू कुमार, जो बिहार के जहानाबाद जिले के रहने वाले हैं। वे पिछले लगभग 20 वर्षों से सावन में सुल्तानगंज से देवघर तक बाबा भोलेनाथ की यात्रा कर रहे हैं, लेकिन इस बार की यात्रा उनके लिए विशेष है।
शंभू ने बताया कि एक रात बाबा भोलेनाथ उनके सपने में आए और कहा, “तुमसे एक गलती हुई है, उसका प्रायश्चित जरूरी है। इस बार मेरे दरबार में कैदी बनकर आओ।”
बाबा के इस आदेश को उन्होंने आदेश नहीं, आशीर्वाद माना और इस बार जंजीरों में जकड़कर यात्रा पर निकल पड़े।

उनका कहना है, “मैंने कोई गलती की है, चाहे वो छोटी हो या बड़ी, उसका पश्चाताप करना मेरा कर्तव्य है। यह यात्रा केवल परंपरा नहीं, आत्मशुद्धि का मार्ग है। मैं खुद को दोषी मानकर बाबा के दरबार में जा रहा हूं।”
उनकी यह भावना सुनकर आसपास मौजूद श्रद्धालु भावुक हो जाते हैं। कोई आंखें पोंछता है, तो कोई हाथ जोड़कर उनका अभिवादन करता है। जैसे ही शंभू ‘कैदी बम’ के रूप में कांवड़िया पथ पर गुजरते हैं, ‘हर हर महादेव’ और ‘बोल बम’ के नारों से वातावरण गूंज उठता है।
सावन मास में सुल्तानगंज से देवघर तक करीब 100 किलोमीटर लंबा कांवड़िया पथ श्रद्धालुओं से भरा रहता है। कोई नंगे पांव कांवड़ उठाए चलता है, कोई डीजे कांवड़ के साथ भक्तिरस में डूबा होता है, तो कोई तिरंगा लिए देश के लिए दुआ करता नजर आता है। लेकिन शंभू कुमार जैसे श्रद्धालु इस यात्रा को आत्मा की शुद्धि और आत्मग्लानि के विमोचन का माध्यम मानते हैं।
बांका जिला प्रशासन ने भी इस विशेष भक्त की भावनाओं को सम्मान दिया है। प्रशासन की ओर से उन्हें सुरक्षा और चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध कराई गई है ताकि उनकी यात्रा निर्विघ्न संपन्न हो। प्रशासनिक अधिकारियों ने कहा कि इस प्रकार की आस्था विरले ही देखने को मिलती है। यह यात्रा केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आत्मिक है।
श्रावणी मेले में श्रद्धालुओं की विविध भक्ति रूपों के बीच शंभू कुमार का यह स्वरूप एक गहरी सीख दे गया—भक्ति केवल उत्सव नहीं, आत्मजागृति और पश्चाताप का भी मार्ग है।













