


भागलपुर। (टीएमबीयू) में अतिथि शिक्षकों की सेवा अवधि बढ़ाने का निर्णय नए विवाद का कारण बन गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने वर्ष 2018 में नियुक्त 76 अतिथि शिक्षकों की सेवा अवधि 11 महीने के लिए बढ़ा दी है, जबकि वर्ष 2025 में नियुक्त होकर बाद में सेवा से हटाए गए अतिथि शिक्षकों ने इस निर्णय पर सवाल उठाते हुए इसे भेदभावपूर्ण करार दिया है।
विश्वविद्यालय की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार, एक जुलाई से प्रभावी इस निर्णय के तहत वर्ष 2018 बैच के 76 अतिथि शिक्षक अपने मूल स्नातकोत्तर (पीजी) विभागों एवं संबंधित महाविद्यालयों में योगदान देंगे। साथ ही मई माह में नवस्थापित डिग्री कॉलेजों में की गई उनकी प्रतिनियुक्ति तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी गई है।
वहीं, सेवा से हटाए गए वर्ष 2025 बैच के अतिथि शिक्षकों का कहना है कि विश्वविद्यालय एक वर्ग के शिक्षकों को सेवा विस्तार दे रहा है, जबकि दूसरे वर्ग की नियुक्तियां समाप्त कर उन्हें बेरोजगार कर दिया गया है। उनका आरोप है कि एक ही विश्वविद्यालय में अलग-अलग मापदंड अपनाए जा रहे हैं, जो समान अवसर और न्याय के सिद्धांत के विपरीत है।
धरना दे रहे शिक्षकों ने यह भी आरोप लगाया कि प्रभारी कुलपति से मुलाकात का आश्वासन मिलने के बावजूद उन्हें पहले विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार और बाद में कुलपति आवास के बाहर सुरक्षा कर्मियों द्वारा रोक दिया गया। इससे शिक्षकों में प्रशासन के प्रति नाराजगी और बढ़ गई है।

प्रदर्शनकारी शिक्षकों का कहना है कि उनकी नियुक्तियां व्यक्तिगत कारणों से रद्द की गईं, जिससे उनकी सामाजिक एवं पेशेवर प्रतिष्ठा प्रभावित हुई है। उनका आरोप है कि मामले की निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें न्याय नहीं मिला तो वे न्यायालय की शरण लेंगे।
दूसरी ओर, सेवा विस्तार पाने वाले अतिथि शिक्षकों के लिए विश्वविद्यालय का यह निर्णय राहत भरा माना जा रहा है। वे लंबे समय से प्रतिनियुक्ति समाप्त कर अपने मूल संस्थानों में वापसी और सेवा अवधि बढ़ाने की मांग कर रहे थे। विश्वविद्यालय के इस निर्णय से हिंदी, उर्दू, वाणिज्य, इतिहास, अर्थशास्त्र, रसायन विज्ञान सहित लगभग 20 विषयों के अतिथि शिक्षकों को लाभ मिला है।
फिलहाल टीएमबीयू में यह मामला केवल सेवा विस्तार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि समान अवसर और समान न्याय को लेकर बहस का विषय बन गया है। एक ओर 76 अतिथि शिक्षकों को 11 माह का सेवा विस्तार मिला है, वहीं दूसरी ओर 2025 बैच के शिक्षक इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए न्यायिक लड़ाई लड़ने की तैयारी में हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस विवाद पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है।
















