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कभी अंग क्षेत्र की पहचान था चंपा आम, अब विलुप्ति की कगार पर; संरक्षण नहीं हुआ तो इतिहास बन जाएंगी पारंपरिक किस्में

प्रदीप विद्रोही

भागलपुर।
अगर आज की युवा पीढ़ी से पूछा जाए कि क्या उन्होंने कभी ‘चंपा आम’ का नाम सुना है, तो संभव है कि अधिकांश लोगों का उत्तर ‘नहीं’ होगा। यह केवल एक आम की किस्म के भुला दिए जाने की कहानी नहीं, बल्कि अंग क्षेत्र की उस समृद्ध कृषि और सांस्कृतिक विरासत के धीरे-धीरे समाप्त होने का संकेत है, जिसने कभी भागलपुर को विशेष पहचान दिलाई थी।

एक समय था जब अंग क्षेत्र की अमराइयों में चंपा आम अपनी विशिष्ट सुगंध, स्वाद और गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध था। मध्यकालीन साहित्य और ऐतिहासिक संदर्भों में भी इस दुर्लभ आम की चर्चा मिलती है। लेकिन बदलते समय, आधुनिक बागवानी और बाजार की मांग के बीच यह देशज किस्म अब लगभग विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी है। नई पीढ़ी के अधिकांश लोग इसके नाम से भी परिचित नहीं हैं।

बाजार की प्रतिस्पर्धा में पीछे छूटी पारंपरिक किस्में

पिछले कुछ दशकों में आम की खेती का स्वरूप तेजी से बदला है। किसान अधिक उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता और अधिक बाजार मूल्य देने वाली उन्नत किस्मों, जैसे आम्रपाली, मल्लिका तथा अन्य संकर प्रजातियों की ओर तेजी से आकर्षित हुए हैं। आर्थिक दृष्टि से यह बदलाव लाभकारी अवश्य है, लेकिन इसके कारण अंग क्षेत्र की पारंपरिक आम की किस्में लगातार समाप्त होती जा रही हैं।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि किसी देशज प्रजाति का विलुप्त होना केवल एक स्वाद या फल का समाप्त होना नहीं है, बल्कि सदियों में विकसित उसकी आनुवंशिक विशेषताओं का भी नुकसान है। ये पारंपरिक किस्में स्थानीय जलवायु, मिट्टी और मौसम के अनुरूप विकसित हुई थीं और भविष्य के कृषि अनुसंधान तथा जलवायु परिवर्तन से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

केवल पेड़ नहीं, सांस्कृतिक विरासत भी हो रही समाप्त

चंपा आम के अलावा अंग क्षेत्र की कई अन्य पारंपरिक किस्में—कलकतिया, बंबई, हेमसागर, कृष्णभोग, सिंदुरिया, सिपिया, गुलाबखास, शुकुल, फजली और सबैया—भी अब पहले की तरह दिखाई नहीं देतीं।

इन किस्मों का संबंध केवल खेती तक सीमित नहीं था। लोकगीतों, पारिवारिक परंपराओं, ग्रामीण जीवन और स्थानीय संस्कृति में इनका विशेष स्थान रहा है। एक पारंपरिक आम की किस्म के समाप्त होने का अर्थ केवल एक पेड़ का खत्म होना नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और सामाजिक स्मृतियों के एक महत्वपूर्ण अध्याय का खो जाना भी है।

क्या भागलपुर में बने ‘मैंगो हेरिटेज ऑर्चर्ड’?

विशेषज्ञों और प्रकृति प्रेमियों के बीच अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या अंग क्षेत्र की पारंपरिक आम की किस्मों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जा रहा है? क्या भागलपुर में ‘मैंगो हेरिटेज ऑर्चर्ड’ (आम विरासत उद्यान) की स्थापना नहीं होनी चाहिए, जहां चंपा सहित सभी विलुप्तप्राय देशज किस्मों का संरक्षण, संवर्धन और प्रदर्शन किया जा सके?

यदि समय रहते इन प्रजातियों के संरक्षण के लिए ठोस पहल नहीं की गई, तो आने वाली पीढ़ियां इन्हें केवल पुस्तकों, शोध पत्रों और पुराने दस्तावेजों में ही पढ़ सकेंगी।

विरासत बचाने का समय

भागलपुर की पहचान केवल रेशम उद्योग या विक्रमशिला महाविहार तक सीमित नहीं है। यहां की अमराइयों और पारंपरिक आम की किस्मों ने भी इस क्षेत्र की विशिष्ट पहचान बनाई है। आवश्यकता इस बात की है कि किसान, कृषि वैज्ञानिक, उद्यान विभाग, प्रशासन और समाज मिलकर इस प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के लिए ठोस प्रयास करें।

क्योंकि जब कोई पारंपरिक आम की प्रजाति विलुप्त होती है, तो केवल एक फल नहीं खोता, बल्कि उसके साथ इतिहास, संस्कृति, जैव विविधता और क्षेत्र की पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।

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