


✍️ रचना : प्राची प्रिया,नवगछिया
नवगछिया के बहतरा गांव की यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं है, यह हमारे समय का आईना है—एक ऐसा आईना, जिसमें झांकने से हम अक्सर बचना चाहते हैं। एक मां, जिसने अपने बच्चों को जन्म दिया, पाला-पोसा, अपने हिस्से की हर खुशी कुर्बान कर दी—उसी मां को आज अपने ही बेटे के हाथों लहूलुहान होना पड़ा।
यह कहानी सिर्फ उमा देवी की नहीं है, यह उस बदलते समाज की कहानी है, जहां रिश्तों की गर्माहट धीरे-धीरे ठंडी पड़ती जा रही है।

कभी कहा जाता था—”बड़ा बेटा बुढ़ापे का सहारा होता है और छोटा बेटा दिल का टुकड़ा।”
लेकिन आज हालात इतने बदल गए हैं कि मां-बाप बड़े बेटे के दरवाजे पर नजर टिकाए रहते हैं और छोटे बेटे से भय खाते हैं। घर के आंगन में जहां कभी बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, वहां अब डर, असुरक्षा और तनाव ने अपनी जगह बना ली है।
उमा देवी का कसूर क्या था?
सिर्फ इतना कि वह मां थीं।
सिर्फ इतना कि उन्होंने अपने छोटे बेटे की भूख और अकेलेपन की चिंता की।
सिर्फ इतना कि ममता ने उन्हें बांधे रखा, भले ही सामने अत्याचार ही क्यों न हो।
आज का समाज एक अजीब मोड़ पर खड़ा है।
जहां एक ओर आधुनिकता, विकास और तरक्की की बातें हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर इंसान अपने मूल संस्कार और रिश्तों की गरिमा भूलता जा रहा है। नशे की बढ़ती प्रवृत्ति, लालच, और संवेदनहीनता ने परिवार की नींव को हिला कर रख दिया है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं?
क्या यही वह समाज है, जहां मां-बाप अपने ही बच्चों से सुरक्षित नहीं हैं?
क्या यही वह दौर है, जहां ममता की कीमत लाठी-डंडों से चुकाई जाएगी?
उमा देवी आज अस्पताल के बिस्तर पर हैं, लेकिन उनकी चुप्पी बहुत कुछ कह रही है।
वह चुप्पी उस हर मां की है, जो अत्याचार सहकर भी अपने बच्चे के लिए दुआ करती है।
वह चुप्पी उस समाज की है, जो सब कुछ देखता है, समझता है, लेकिन अक्सर खामोश रह जाता है।

आज जरूरत सिर्फ कानून की नहीं, बल्कि संस्कारों की है।
जरूरत है कि हम अपने बच्चों को सिर्फ पढ़ाएं-लिखाएं ही नहीं, बल्कि उन्हें इंसान बनना भी सिखाएं।
जरूरत है कि हम रिश्तों की अहमियत को फिर से समझें और समझाएं।
क्योंकि अगर आज भी हम नहीं चेते,
तो कल हर घर में एक उमा देवी होगी—
और हर आंगन में ममता की ऐसी ही दर्दभरी कहानी गूंजेगी।













