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स्वास्थ्य अधिकारियों को बच्चों की समय पर पहचान और उपचार सुनिश्चित करने का निर्देश

पूर्णिया । जिले में कुपोषण एवं एनीमिया से ग्रसित बच्चों की समय पर पहचान, उचित उपचार और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जिला स्वास्थ्य विभाग द्वारा शनिवार को एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में सभी प्रखंडों के स्वास्थ्य अधिकारियों को समुदाय स्तर पर कमजोर एवं कुपोषित बच्चों की पहचान कर उन्हें शीघ्र उपचार के लिए पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) और आवश्यकतानुसार अस्पतालों में रेफर करने का निर्देश दिया गया।

राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल (जीएमसीएच) पूर्णिया स्थित आरटीपीसीआर भवन में आयोजित कार्यशाला की अध्यक्षता प्रभारी सिविल सर्जन डॉ. के.एम. दास ने की। उन्होंने कहा कि कुपोषण और एनीमिया बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास में गंभीर बाधा बनते हैं। ऐसे बच्चों की समय पर पहचान और उपचार से उन्हें स्वस्थ एवं सुरक्षित जीवन प्रदान किया जा सकता है।

कार्यशाला में एसीएमओ डॉ. आर.पी. मंडल, डीआईओ डॉ. विनय मोहन, जीएमसीएच के शिशु रोग विभागाध्यक्ष डॉ. प्रेम प्रकाश, डीपीएम सुरेंद्र कुमार दास, डीसीएम संजय कुमार दिनकर, डीपीसी डॉ. सुधांशु शेखर, डीसीक्यूए डॉ. अनिल कुमार शर्मा, जिला एम एंड ई अधिकारी आलोक कुमार, एनआरसी चिकित्सक डॉ. रजनीश कुमार, यूनिसेफ पोषण समन्वयक निधि भारती, पिरामल स्वास्थ्य के प्रमंडलीय समन्वयक अमित शर्मा, जिला प्रबंधक चंदन कुमार सहित विभिन्न स्वास्थ्य अधिकारी एवं कर्मी उपस्थित थे।

कुपोषित बच्चों को एनआरसी भेजने पर जोर

कार्यशाला में डीपीसी डॉ. सुधांशु शेखर ने कहा कि जन्म से ही कमजोर या कुपोषित बच्चों की पहचान एएनएम और आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से की जानी चाहिए। ऐसे बच्चों को उनकी माताओं सहित पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) भेजना सुनिश्चित किया जाए, जहां प्रशिक्षित चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा विशेष देखभाल, पोषण एवं उपचार उपलब्ध कराया जाता है।

उन्होंने बताया कि एनआरसी में उपचार के बाद अधिकांश बच्चे स्वस्थ होकर सामान्य जीवन की ओर लौटते हैं। इसलिए क्षेत्र में चिन्हित प्रत्येक गंभीर रूप से कुपोषित बच्चे को उपचार से जोड़ना स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिकता है।

कम वजन वाले बच्चों में एनीमिया का अधिक खतरा

जीएमसीएच के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रेम प्रकाश ने कहा कि जन्म के समय कम वजन वाले या कमजोर शिशुओं में एनीमिया होने की आशंका अधिक रहती है। ऐसे बच्चों के शरीर में लाल रक्त कणिकाओं (आरबीसी) और हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है, जिससे उनका विकास प्रभावित होता है।

उन्होंने स्वास्थ्य अधिकारियों को निर्देश दिया कि क्षेत्र में ऐसे बच्चों की पहचान कर उन्हें आवश्यक चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराई जाए। अत्यधिक कमजोर एवं गंभीर स्थिति वाले बच्चों को तत्काल नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराकर विशेष उपचार दिलाया जाए, ताकि उन्हें समय पर स्वास्थ्य लाभ मिल सके।

समुदाय स्तर पर जागरूकता बढ़ाने का निर्देश

कार्यशाला में अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि आंगनबाड़ी केंद्रों, स्वास्थ्य उपकेंद्रों तथा गांव स्तर पर विशेष अभियान चलाकर कुपोषण एवं एनीमिया के प्रति लोगों को जागरूक किया जाए। साथ ही बच्चों के नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, पोषण परामर्श एवं समय पर उपचार सुनिश्चित किया जाए।

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने विश्वास जताया कि सामूहिक प्रयासों से जिले में कुपोषण और एनीमिया की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकेगा तथा बच्चों को स्वस्थ और सुरक्षित भविष्य प्रदान किया जा सकेगा।

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