


आज के युवाओं की सबसे बड़ी समस्या केवल बेरोजगारी नहीं, बल्कि अपने भविष्य को लेकर बढ़ती अनिश्चितता भी है। प्रतियोगी परीक्षाएं युवाओं के सपनों और करियर से सीधे जुड़ी होती हैं। लाखों छात्र वर्षों तक कठिन परिश्रम कर इन परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। ऐसे में यदि परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी, पेपर लीक, तकनीकी त्रुटियां, भर्ती में देरी या अन्य अनियमितताएं सामने आती हैं, तो इसका प्रभाव केवल परीक्षा परिणाम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि युवाओं के आत्मविश्वास और व्यवस्था पर उनके विश्वास को भी प्रभावित करता है।
एक छात्र के तौर पर मेरी चिंता किसी राजनीतिक दल या सरकार की आलोचना करना नहीं है, बल्कि उन समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करना है जो लगातार प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़े कर रही हैं। प्रश्नपत्र लीक होना, परीक्षा केंद्रों का सैकड़ों किलोमीटर दूर आवंटन, भर्ती प्रक्रिया में वर्षों की देरी, परिणामों में अनिश्चितता और प्रश्नपत्रों में त्रुटियां जैसी घटनाएं अब सामान्य चर्चा का विषय बन गई हैं। इससे युवाओं में निराशा और असंतोष बढ़ रहा है।
यदि कोई व्यक्ति अपनी जीवन भर की कमाई बैंक में जमा करता है, तो वह उस व्यवस्था पर भरोसा करता है। लेकिन यदि बैंक ही उसकी जमा पूंजी की सुरक्षा न कर सके, तो उसका विश्वास टूट जाता है। ठीक उसी प्रकार प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता भी युवाओं के विश्वास पर आधारित है। जब परीक्षा प्रक्रिया बार-बार विवादों में घिरती है, तो युवाओं का व्यवस्था पर भरोसा कमजोर पड़ने लगता है।
ऐसे में सवाल उठता है कि प्रतियोगी परीक्षाओं को पूरी तरह निष्पक्ष और गड़बड़ी-मुक्त कैसे बनाया जाए?
सबसे पहले प्रश्नपत्र निर्माण, सुरक्षा और वितरण की प्रक्रिया को अत्याधुनिक तकनीक से सुरक्षित बनाया जाना चाहिए। जहां संभव हो, कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। प्रश्नपत्र तैयार होने के बाद उसकी बहुस्तरीय जांच हो, ताकि त्रुटिपूर्ण प्रश्नों की संभावना न्यूनतम हो सके। साथ ही परीक्षा केंद्रों का आवंटन इस प्रकार किया जाए कि अभ्यर्थियों को अनावश्यक रूप से लंबी दूरी तय न करनी पड़े।
दूसरा, सभी भर्ती एजेंसियों के लिए निश्चित परीक्षा एवं भर्ती कैलेंडर लागू होना चाहिए। परीक्षा से लेकर अंतिम नियुक्ति तक की प्रक्रिया समयबद्ध हो। बार-बार की देरी युवाओं के समय, ऊर्जा और आर्थिक संसाधनों को प्रभावित करती है। पेपर लीक और परीक्षा में धांधली जैसे मामलों में त्वरित एवं कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि ऐसे अपराधों पर प्रभावी रोक लग सके।
तीसरा, समस्या के सामाजिक पहलू को भी समझना आवश्यक है। आज बड़ी संख्या में युवा सीमित सरकारी नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। इसका एक कारण यह भी है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था कौशल विकास, नवाचार और वैकल्पिक रोजगार के अवसरों को पर्याप्त महत्व नहीं दे पाती। यदि विद्यालयों, महाविद्यालयों और कौशल विकास संस्थानों को और मजबूत बनाया जाए, तो युवाओं के सामने रोजगार के अधिक विकल्प उपलब्ध होंगे और प्रतियोगी परीक्षाओं पर अत्यधिक दबाव भी कम होगा।
सरकार को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, मानव संसाधन विकास और सार्वजनिक संस्थानों को मजबूत करने की दिशा में लगातार काम करना होगा। वहीं युवाओं को भी केवल सरकारी नौकरी तक सीमित न रहकर कौशल विकास, उद्यमिता और अन्य करियर विकल्पों की ओर ध्यान देना चाहिए।
अंततः प्रतियोगी परीक्षाओं को गड़बड़ी-मुक्त बनाना केवल प्रशासनिक सुधार का विषय नहीं है, बल्कि यह करोड़ों युवाओं के भविष्य और देश के विकास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। जब परीक्षाएं निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध होंगी, तभी युवाओं का व्यवस्था पर विश्वास मजबूत होगा और देश अपनी युवा शक्ति को वास्तविक मानव संसाधन में परिवर्तित कर सकेगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि परीक्षा प्रणाली को इतना मजबूत और विश्वसनीय बनाया जाए कि हर अभ्यर्थी को यह विश्वास हो कि उसकी मेहनत का मूल्यांकन निष्पक्ष रूप से होगा। यही विश्वास किसी भी विकसित और सशक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी है।
















