


भागलपुर। आज के दौर में बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी खुश और आनंदित रहना चाहते हैं। अधिकांश लोग यह मानते हैं कि धन, पद, प्रतिष्ठा और सम्मान प्राप्त कर लेने से जीवन में सुख और आनंद आ जाएगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि ये सभी चीजें केवल क्षणिक सुख प्रदान करती हैं। कई बार इनकी प्राप्ति व्यक्ति के अहंकार को बढ़ा देती है और वह अपने वास्तविक स्वरूप से दूर हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति न तो भौतिक सुखों का पूर्ण आनंद ले पाता है और न ही आत्मिक शांति प्राप्त कर पाता है।
ये विचार अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर योग एवं अध्यात्म विषय पर चर्चा करते हुए आचार्य अंशु ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि बिना किसी बाहरी कारण के हमेशा आनंदित रहने का एकमात्र उपाय आत्मा के स्तर पर जीना है। आत्मा का स्वभाव ही आनंद है, जबकि अधिकांश लोग शरीर, मन और भावनाओं के स्तर पर जीवन व्यतीत करते हैं। शरीर बीमार हो जाए तो दुःख, मनोनुकूल परिणाम न मिले तो तनाव, सम्मान न मिले तो बेचैनी और इच्छाएं पूरी न हों तो क्रोध उत्पन्न होता है।
आचार्य अंशु ने कहा कि इन सभी मानसिक और भावनात्मक विकारों पर विजय पाने का एकमात्र मार्ग आत्मज्ञान है और आत्मज्ञान की ओर ले जाने वाला सबसे प्रभावी साधन योग है। योग केवल शरीर और मन को स्वस्थ रखने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को उसकी आत्मा से जोड़ने का कार्य भी करता है। ध्यान और साधना के माध्यम से मनुष्य आत्मा का अनुभव कर सकता है और जीवन के वास्तविक आनंद को प्राप्त कर सकता है।
उन्होंने कहा कि अध्यात्म के चार प्रमुख स्तंभ हैं—साक्षी, ध्यान, समाधि और सुमिरन। साक्षी भाव का अर्थ है अपने प्रत्येक कर्म को जागरूकता और आत्मबोध के साथ करना। जब व्यक्ति कर्म के फल की चिंता छोड़कर केवल कर्म करने का आनंद लेने लगता है, तब उसके जीवन में सहज आनंद का संचार होता है।
आचार्य अंशु ने बताया कि स्वयं के अस्तित्व का आनंद लेना ही ध्यान है, जबकि दूसरों के प्रति प्रेम और करुणा का भाव विकसित करना भी ध्यान का ही विस्तार है। ध्यान और प्रेम के माध्यम से व्यक्ति निरंतर आनंद की अवस्था में रह सकता है। उन्होंने कहा कि समाधि आत्मिक चेतना की सर्वोच्च अवस्था है और सुमिरन जीवन के प्रत्येक क्षण को जागरूकता और कृतज्ञता के साथ जीने की कला है।
उन्होंने कहा कि साक्षी, ध्यान, समाधि और सुमिरन का वास्तविक अनुभव केवल योग के माध्यम से ही संभव है। योग व्यक्ति को स्वयं से जोड़ता है, आत्मबोध कराता है और उसे परिस्थितियों से परे आंतरिक आनंद का अनुभव कराता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को योग को केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक समग्र कला के रूप में अपनाना चाहिए।
















