


@ पुरानी आठगामा पन्नूचक के ग्रामीणों की मजबूरी बनी नाव, दशकों पुरानी पुल की मांग अब भी अधूरी।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। घोघा नदी का यह दृश्य सिर्फ बढ़ते जलस्तर की तस्वीर नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही ग्रामीणों की पीड़ा की कहानी बयां करता है। नदी का पानी बढ़ते ही पुरानी आठगामा पन्नूचक के किसानों और ग्रामीणों की मुश्किलें कई गुना बढ़ जाती हैं।
तस्वीर में दिखाई दे रहा किसान अपनी फसल लेकर गांव लौटने के लिए नाव का इंतजार कर रहा है। उसके सामने सिर्फ नदी नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था की चुनौती खड़ी है, जिससे यहां के लोग आजादी के बाद से ही जूझते आ रहे हैं। गांव तक पहुंचने के रास्ते बाढ़ के पानी में डूब जाते हैं और ग्रामीणों का जीवन पूरी तरह नावों पर निर्भर हो जाता है।
हर साल करीब तीन महीने तक यह इलाका बाढ़ की मार झेलता है। पानी बढ़ने के साथ ही ग्रामीण अपने राशन, जरूरी सामान और पशुओं के चारे को धीरे-धीरे सुरक्षित ऊंचे स्थानों तक पहुंचाने में जुट जाते हैं। गांव को जोड़ने वाले सभी चचरी पुल पानी में समा चुके हैं, जिससे आवागमन का एकमात्र साधन नाव ही रह जाती है।
ग्रामीणों का कहना है कि घोघा-कटरिया नदी पर पुल निर्माण की मांग वे वर्षों से करते आ रहे हैं। नदी पार करने के दौरान अब तक कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद स्थायी समाधान की दिशा में ठोस पहल नहीं हो पाई है।
बाढ़ के दिनों में बच्चों की पढ़ाई, मरीजों का इलाज, किसानों की उपज को बाजार तक पहुंचाना और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना ग्रामीणों के लिए बड़ी चुनौती बन जाती हैं। हर साल पानी उतरने के बाद हालात सामान्य होने का इंतजार किया जाता है, लेकिन पुल की मांग वहीं की वहीं रह जाती है।
ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों का ध्यान इस गंभीर समस्या की ओर अब तक पर्याप्त रूप से नहीं गया है। घोघा नदी का बढ़ता जलस्तर हर वर्ष यहां के लोगों को वही सवाल याद दिलाता है। आखिर कब खत्म होगी नाव के सहारे जिंदगी जीने की मजबूरी!















