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प्रदीप विद्रोही

भागलपुर। श्रावणी मेले की कांवर यात्रा महज एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि आस्था, तपस्या, संकल्प और शिवभक्ति की ऐसी अनूठी यात्रा है, जिसमें लाखों कदम बाबा बैद्यनाथ के दर्शन की उम्मीद लेकर आगे बढ़ते हैं। सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर कांवरिये जब बाबाधाम की ओर निकलते हैं तो रास्ते का हर पड़ाव उनकी यात्रा की कहानी कहता है। इन्हीं पड़ावों में एक ऐसा भी पड़ाव है, जिसे कांवरिये ‘दुखहरण नदी’ के नाम से जानते हैं – गोड़ियारी नदी।


लोकमान्यता है कि सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर बाबाधाम की ओर बढ़ने वाले कांवरिये जैसे ही गोड़ियारी नदी के पास पहुंचते हैं और इसके पानी में कदम रखते हैं, वैसे ही उनकी यात्रा की थकान और कष्ट कुछ पल के लिए पीछे छूट जाते हैं। नदी की कल-कल करती धारा, ठंडा पानी और आसपास का प्राकृतिक वातावरण कांवरियों को ऐसा सुकून देता है, मानो लंबी पदयात्रा के बाद प्रकृति स्वयं उनका स्वागत करने पहुंची हो।
इसी विश्वास ने गोड़ियारी को ‘दुखहरण नदी’ का नाम दिया है। कांवरियों के बीच यह मान्यता गहरी है कि नदी में उतरते ही यात्रा की थकान दूर होती है और मन को नई ऊर्जा मिलती है। कोई इसे बाबा भोलेनाथ की कृपा मानता है तो कोई नदी की शीतल धारा का चमत्कार। लेकिन विश्वास सभी का एक ही है – गोड़ियारी पहुंचकर मन हल्का हो जाता है।

सुल्तानगंज से देवघर तक की कांवर यात्रा करीब 105 किलोमीटर की मानी जाती है। इस कठिन पैदल यात्रा में कांवरिये तपती सड़क, पथरीले रास्ते और मौसम की चुनौतियों को पार करते हुए लगातार ‘बोल बम’ का जयघोष करते आगे बढ़ते हैं। सुल्तानगंज से करीब 85 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद कांवरिये गोड़ियारी नदी के पास पहुंचते हैं। देवघर से करीब 15 किलोमीटर पहले आने वाला यह पड़ाव कांवरियों के लिए यात्रा के अंतिम हिस्से की ओर बढ़ने का अहसास भी कराता है। बाबाधाम अब ज्यादा दूर नहीं रहता। शरीर थका होता है, पैरों में दर्द होता है, लेकिन मन में बाबा बैद्यनाथ के दर्शन की बेचैनी और बढ़ जाती है। ऐसे समय में गोड़ियारी नदी का मिलना कांवरियों के लिए किसी राहत से कम नहीं होता।

गोड़ियारी नदी के किनारे पहुंचते ही कांवरियों का अंदाज ही बदल जाता है। अभी तक जो कांवरिये तपती राह पर कदम बढ़ाते हुए थकान से जूझ रहे थे, वही नदी के पानी में उतरते ही मस्ती में डूब जाते हैं।
कोई नदी में डुबकी लगाता है, कोई पानी के छींटे उड़ाता है, तो कोई अपने साथियों के साथ हंसी-मजाक करते हुए कुछ पल के लिए यात्रा की सारी थकान भूल जाता है। कई कांवरिये जी भरकर स्नान करते हैं और फिर नई ऊर्जा के साथ कांवर उठाकर बाबाधाम की ओर बढ़ जाते हैं।नदी के किनारे ‘बोल बम’, ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष और कांवरियों की मस्ती से वातावरण पूरी तरह शिवमय हो जाता है।
कांवरियों के लिए यह केवल स्नान करने की जगह नहीं है। यह उनके लिए ऐसा पड़ाव है जहां कुछ क्षण रुककर वे अपने शरीर को आराम और मन को सुकून देते हैं।

गोड़ियारी नदी का एक अलग रूप सामान्य दिनों में देखने को मिलता है। गर्मी और दूसरे महीनों में नदी का बड़ा हिस्सा सूखा नजर आता है। नदी की तलहटी में दूर तक फैली बालू देखकर शायद कोई अंदाजा भी न लगा पाए कि सावन में यही स्थान हजारों कांवरियों की आस्था और उल्लास से भर जाता है। लेकिन श्रावणी मेले के साथ गोड़ियारी का रंग बदल जाता है। नदी के आसपास कांवरियों की आवाजाही बढ़ जाती है। जगह-जगह सेवा शिविर, पानी, विश्राम और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था दिखाई देती है। दूर-दूर से पैदल चले आ रहे कांवरिये यहां पहुंचकर कुछ देर विश्राम करते हैं और फिर अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ जाते हैं।
बालू के बीच दिखाई देती नदी की पतली धारा भी मानो यह संदेश देती है कि आस्था की धारा कभी सूखती नहीं।

गोड़ियारी पहुंचने वाले कांवरियों के लिए नदी में स्नान करना किसी उत्सव से कम नहीं होता। कई कांवरिये अपने साथियों के साथ पानी में उतरकर खूब मस्ती करते हैं। लंबी यात्रा की थकान, पैरों का दर्द और गर्मी की तपिश कुछ देर के लिए भुलाकर वे नदी में डुबकी लगाते हैं। किसी के चेहरे पर मुस्कान होती है, किसी के कंठ से ‘बोल बम’ निकलता है और कोई बाबा बैद्यनाथ के जयकारे लगाते हुए नदी की धारा में डुबकी लगाता नजर आता है। यात्रा की गंभीर साधना के बीच यह उल्लास कांवर यात्रा के उस मानवीय पक्ष को भी सामने लाता है, जहां श्रद्धा के साथ आनंद और भाईचारा भी जुड़ा हुआ है।
गोड़ियारी सिर्फ नदी नहीं, कांवरियों की भावनाओं का पड़ाव है
कांवर यात्रा में कई पड़ाव आते हैं, लेकिन हर पड़ाव की अपनी अनुभूति होती है। गोड़ियारी की खासियत यही है कि यहां पहुंचते ही कांवरियों को लगता है कि उन्होंने अपनी कठिन यात्रा का एक बड़ा हिस्सा पार कर लिया है। सुल्तानगंज में गंगा से जल उठाने के बाद शुरू हुई यात्रा अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी होती है। शरीर थक चुका होता है, मगर बाबा के दरबार तक पहुंचने की लालसा थकान को पीछे छोड़ देती है। गोड़ियारी इसी भावना के बीच एक छोटा-सा विश्राम देती है।यहां नदी में डुबकी लगाने के बाद कांवरिया फिर अपने कांवर को कंधे पर रखते हैं। पैरों में भले ही दर्द हो, लेकिन चेहरे पर अलग ही चमक दिखाई देती है। उनके कदम फिर बाबाधाम की ओर बढ़ने लगते हैं।

गोड़ियारी की कहानी सिर्फ पानी, बालू और नदी की कहानी नहीं है। यह उन लाखों कदमों की कहानी है, जो हर वर्ष बाबा बैद्यनाथ के दरबार तक पहुंचने के लिए सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करते हैं।
यह उन कांवरियों की कहानी है, जो रास्ते की मुश्किलों को चुनौती देते हुए आगे बढ़ते हैं। यह उस विश्वास की कहानी है, जिसमें थकान के बावजूद कदम रुकते नहीं और प्यास के बावजूद ‘बोल बम’ की आवाज धीमी नहीं पड़ती।
शायद इसीलिए कांवरिये गोड़ियारी को सिर्फ नदी नहीं कहते। उनके लिए यह दुख हरने वाली धारा है।
मान्यता अपनी जगह है, लेकिन कांवरियों के लिए गोड़ियारी का सच शायद इससे भी खूबसूरत है—लंबी यात्रा के बीच कुछ पल का ठहराव, ठंडे पानी में एक डुबकी, साथियों के साथ थोड़ी मस्ती, चेहरे पर लौटती मुस्कान और मन में बाबा बैद्यनाथ के दर्शन की बढ़ती उम्मीद और जब कांवरिया नदी से निकलकर फिर कांवर कंधे पर रखता है, तो उसके कदमों में एक नई रफ्तार आ जाती है।
मानो गोड़ियारी की धारा उसके दुख, थकान और दर्द को अपने साथ बहा ले गई हो और बदले में उसे बाबाधाम तक पहुंचने की नई ऊर्जा दे गई हो।
इसीलिए कांवरियों की जुबान पर एक ही विश्वास सुनाई देता है – ‘गोड़ियारी में कदम पड़ते ही दुख हर जाता है, और बाबा के दरबार तक पहुंचने का हौसला और बढ़ जाता है।’

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