


प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। अंग प्रदेश की सदियों पुरानी लोक आस्था, संस्कृति और मंजूषा कला से जुड़ा बिहुला-विषहरी पूजा महोत्सव अब नई पहचान के साथ सामने आएगा। बिहार सरकार ने इस ऐतिहासिक पर्व को राजकीय दर्जा देते हुए अपने सांस्कृतिक कैलेंडर में शामिल कर लिया है। इसके साथ ही हर वर्ष अगस्त में जिला प्रशासन की देखरेख में ‘बिहुला महोत्सव’ आयोजित होगा।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने प्रदेशवासियों और देशभर के श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे भागलपुर आकर इस अनूठी लोक परंपरा का हिस्सा बनें और मां मनसा को बाएं हाथ से अर्घ्य अर्पित करने की सदियों पुरानी परंपरा का सम्मान करें।
जिला कला संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन ने बताया कि जिला प्रशासन के प्रस्ताव को विभाग ने स्वीकृति दे दी है। इससे मंजूषा कला, बिहुला-लखेंद्र की लोकगाथा और विषहरी पूजा को राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी। महोत्सव में लोक कलाकारों, विषहरी गीतों और पारंपरिक अनुष्ठानों को विशेष मंच मिलेगा।
इस वर्ष भागलपुर जिले के 182 स्थानों पर मां विषहरी की प्रतिमाएं स्थापित होंगी, जिनमें 96 प्रतिमाएं शहरी क्षेत्र में रहेंगी। सबसे अधिक श्रद्धालु चंपानगर स्थित मनसा देवी मंदिर पहुंचते हैं, जहां पूजा का मुख्य आकर्षण रहता है।
ऐसे चलेगा महोत्सव
16 अगस्त: सिंह नक्षत्र में मां विषहरी की प्रतिमा स्थापना।
17 अगस्त: कुंवारी डालिया चढ़ाने के बाद शाम को बाला लखेंद्र की भव्य बारात निकलेगी। रात में सर्पदंश और सती बिहुला की मंजूषा यात्रा का लोकनाट्य मंचन होगा।
18 अगस्त: सुहागिन महिलाएं मां मनसा को डालिया और खोइछा अर्पित करेंगी।
19 अगस्त: पारंपरिक झांकियों के साथ प्रतिमाओं का विसर्जन होगा।
क्यों दिया जाता है बाएं हाथ से अर्घ्य:
लोक मान्यता के अनुसार, सती बिहुला की तपस्या के बाद चांदो सौदागर ने मां मनसा की पूजा तो स्वीकार की, लेकिन क्रोधवश बाएं हाथ से अर्घ्य अर्पित किया। तभी से अंग क्षेत्र में मां विषहरी की पूजा के दौरान बाएं हाथ से अर्घ्य देने की परंपरा चली आ रही है।
राजकीय दर्जा मिलने के बाद उम्मीद है कि यह महोत्सव न केवल अंग संस्कृति की पहचान को नई ऊंचाई देगा, बल्कि भागलपुर में धार्मिक पर्यटन और स्थानीय कलाकारों के लिए भी नए अवसर लेकर आएगा।

















