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@ जल संकट और जलवायु परिवर्तन के इस दौर में ‘सबौर आदित्य’ जैसी धान की किस्में खेती का भविष्य बदल सकती हैं। कम पानी में अधिक उपज देने की इसकी क्षमता न केवल किसानों की लागत घटा सकती है, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा को भी नई मजबूती प्रदान कर सकती है।

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प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। बदलते मौसम, घटते भूजल स्तर और सिंचाई की बढ़ती लागत के बीच बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर के वैज्ञानिकों ने धान की एक ऐसी नई किस्म विकसित की है, जो किसानों के लिए बड़ी राहत साबित हो सकती है। ‘सबौर आदित्य’ नामक यह जलवायु-अनुकूल धान की किस्म कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देने में सक्षम है। केंद्रीय प्रभेद चयन समिति ने इसे देश के 15 राज्यों में व्यावसायिक खेती के लिए मंजूरी दे दी है।
यह उपलब्धि तीन वर्षों तक 19 राज्यों में किए गए वैज्ञानिक परीक्षणों के बाद हासिल हुई है। परीक्षणों में इस किस्म ने सामान्य धान की तुलना में लगभग 33 प्रतिशत अधिक उत्पादन देकर अपनी क्षमता साबित की।
112 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन की क्षमता
वैज्ञानिकों के अनुसार, ‘सबौर आदित्य’ की औसत उत्पादकता 70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जबकि अनुकूल परिस्थितियों में यह 112 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन दे सकता है। किसानों के खेतों पर किए गए क्रॉप कटिंग परीक्षणों में भी 89 से 96 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज दर्ज की गई। बिहार के कई जिलों में इसके सफल परीक्षण हो चुके हैं।
कम लागत, कम पानी और आसान प्रबंधन:
यह किस्म 140–145 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे कम सिंचाई, सीमित उर्वरक और कम लागत में उगाया जा सकता है। पौधों की ऊंचाई 100–105 सेंटीमीटर होने के कारण तेज हवा में फसल के गिरने की संभावना कम रहती है। साथ ही, मध्यम कद होने से पुआल का प्रबंधन भी आसान हो जाता है, जिससे पराली जलाने की समस्या कम करने में मदद मिल सकती है।
BAU के वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि:
इस किस्म को BAU, सबौर की वनस्पति अनुसंधान इकाई, धनगई (बिक्रमगंज) के डॉ. प्रकाश सिंह, डॉ. कमलेश कुमार प्रसाद और उनकी टीम ने अखिल भारतीय समन्वित चावल सुधार परियोजना के तहत विकसित किया है।
विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह ने बताया कि इस वर्ष बड़े पैमाने पर बीज उत्पादन किया जा रहा है, ताकि अगले धान सीजन से पहले किसानों को ‘सबौर आदित्य’ के बीज उपलब्ध कराए जा सकें।
क्यों है यह खबर खास:
जल संकट और जलवायु परिवर्तन के इस दौर में ‘सबौर आदित्य’ जैसी धान की किस्में खेती का भविष्य बदल सकती हैं। कम पानी में अधिक उपज देने की इसकी क्षमता न केवल किसानों की लागत घटा सकती है, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा को भी नई मजबूती प्रदान कर सकती है।

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