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चिंता, अब हर घर के पानी की जांच की उठी मांग

@ भागलपुर स्थित सबौर के सुल्तानपुर भिट्ठी गांव में कैंसर के बढ़ते मामलों से दहशत। दूषित पानी और पर्यावरण पर उठ रहे सवाल, इलाज की कमी ने संकट को और गहरा किया।

प्रदीप विद्रोही

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भागलपुर। भागलपुर जिले का कहलगांव कभी तपोभूमि और तापभूमि के नाम से जाना जाता था, लेकिन समय के साथ इसे ‘कैंसरभूमि’ के रूप में भी पहचान मिलने लगी। यहां ब्लड कैंसर, मसूड़े का कैंसर, स्तन कैंसर और गर्भाशय कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से कई लोगों की मौत हो चुकी है। मौत का यह सिलसिला आज भी जारी है। वजहें ढूंढने का सरकारी प्रयास शून्य है। फिलहाल, जिले का सबौर प्रखंड भी ऐसे ही गंभीर स्वास्थ्य संकट से गुजर रहा है, जिसने पूरे इलाके को चिंता में डाल दिया है। यहां कैंसर का कहर लगातार जारी है। भय के कारण लोगों का सामान्य जीवन प्रभावित हो गया है। भागलपुर से सटे सबौर प्रखंड के सुल्तानपुर भिट्ठी गांव में लगातार सामने आ रहे कैंसर के मामलों ने इस गांव को लोगों के बीच ‘कैंसर गांव’ के रूप में चर्चित कर दिया है। हाल ही में लगाए गए विशेष स्वास्थ्य शिविर में 27 मरीजों की जांच की गई, जिसके बाद ग्रामीणों की आशंकाएं और गहरा गई हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि बीमारी के पीछे गांव का पानी और आसपास का पर्यावरण जिम्मेदार हो सकता है। यही कारण है कि अब केवल सरकारी बोरिंग ही नहीं, बल्कि गांव के हर घर के पानी की वैज्ञानिक जांच कराने की मांग तेज हो गई है।
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि वर्षों से दूषित पानी पीने के कारण लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। इससे पहले पीएचईडी की टीम ने गांव के सात स्थानों से पानी के नमूने लिए थे। जांच में आर्सेनिक की मात्रा निर्धारित मानक के भीतर मिली, लेकिन फ्लोराइड का स्तर सामान्य से अधिक पाया गया। अब ग्रामीणों की मांग है कि पूरे गांव का व्यापक जल परीक्षण कराया जाए तथा जरूरतमंद परिवारों को सुरक्षित पेयजल और वाटर फिल्टर उपलब्ध कराए जाएं।
गांव में कैंसर का खतरा कोई नई बात नहीं है। अक्टूबर 2022 में आयोजित कैंसर जांच शिविर में आठ नए मरीज सामने आए थे, जबकि तब तक नौ लोगों की मौत हो चुकी थी। मार्च 2023 तक दास टोला में मृतकों की संख्या बढ़कर 10 हो गई थी।
फरवरी 2023 में आयोजित एक अन्य स्वास्थ्य शिविर में 190 लोगों की जांच की गई थी। इनमें 11 लोग कैंसर के संदिग्ध पाए गए, जबकि 18 लोगों के मुंह में ऐसे बदलाव मिले, जिन्हें विशेषज्ञों ने गंभीर संकेत माना।
बीमारी से जूझ रहे लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इलाज की है। भागलपुर के सरकारी अस्पतालों में कैंसर के समुचित उपचार की सुविधा नहीं होने के कारण मरीजों को प्रारंभिक जांच के बाद पटना के बड़े अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता है। आर्थिक तंगी, लंबी दूरी और जागरूकता की कमी के कारण कई मरीज बीच में ही इलाज छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।
लगातार बढ़ती चिंताओं के बीच प्रशासन ने कुछ पहल शुरू की है। सुल्तानपुर भिट्ठी में उप-स्वास्थ्य केंद्र खोलने की प्रक्रिया चल रही है। वहीं, भागलपुर में कैंसर अस्पताल स्थापित करने की योजना पर भी काम शुरू हो गया है। इस संबंध में जिलाधिकारी और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के बीच बैठकें हो चुकी हैं।
हालांकि, ग्रामीणों का कहना है कि केवल योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं। जब तक पूरे इलाके के पानी, मिट्टी और पर्यावरण की वैज्ञानिक जांच नहीं होगी और उसके आधार पर ठोस कार्रवाई नहीं की जाएगी, तब तक कैंसर के बढ़ते मामलों पर रोक लगाना मुश्किल होगा।
अब पूरे गांव की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार व्यापक वैज्ञानिक जांच कब कराती है और उसकी रिपोर्ट क्या कहती है। यदि समय रहते कारणों की पहचान नहीं हुई, तो यह समस्या केवल एक गांव तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि आसपास के इलाकों के लिए भी गंभीर चेतावनी साबित हो सकती है।

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