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प्रदीप विद्रोही

भागलपुर। जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा संकट और संसाधनों के बढ़ते दोहन के बीच बिहार के कहलगांव से सतत विकास का एक महत्वपूर्ण संदेश सामने आया। शंकर साह विक्रमशिला महाविद्यालय (एस.एस.वी. कॉलेज), कहलगांव में शुक्रवार को “Advancing Sustainability Through Circular and Hydrogen Economy: Challenges and Innovative Solutions” विषय पर दो दिवसीय बहुविषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ हुआ। इस आयोजन ने न केवल शिक्षा और शोध जगत के विशेषज्ञों को एक मंच पर एकत्र किया, बल्कि भविष्य की हरित अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर गंभीर विमर्श की दिशा भी तय की।
महाविद्यालय के आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (IQAC) द्वारा इंडियन केमिकल सोसाइटी (भागलपुर चैप्टर) एवं एग्रो-इकोनॉमिक रिसर्च सेंटर, भागलपुर (भारत सरकार) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह संगोष्ठी 10 एवं 11 जुलाई तक चलेगी। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और शोध संस्थानों से जुड़े शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों एवं शोधार्थियों की सहभागिता ने आयोजन को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।
सतत विकास के नए मॉडल पर जोर:
उद्घाटन सत्र की मुख्य अतिथि तिलका माझी भागलपुर विश्वविद्यालय की सामाजिक विज्ञान संकायाध्यक्ष एवं संगोष्ठी की पेट्रोन प्रो. (डॉ.) कुमारी सुदामा यादव ने कहा कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में विकास की पारंपरिक अवधारणाओं से आगे बढ़कर सर्कुलर और हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था जैसे नवाचारों को अपनाना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि संसाधनों का पुनः उपयोग, स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण ही भविष्य के विकास का आधार बनेंगे।
तिलका माझी भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति एवं संगोष्ठी के चीफ पेट्रोन प्रो. विमलेन्दु शेखर झा ने अपने शुभकामना संदेश में कहा कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय चुनौतियों के दौर में इस प्रकार की संगोष्ठियां केवल अकादमिक गतिविधि नहीं, बल्कि समाज को नई दिशा देने वाला प्रयास हैं। उन्होंने इसे सतत विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एक सार्थक पहल बताया।
विद्वानों की गरिमामयी उपस्थिति:
उद्घाटन सत्र में इंडियन केमिकल सोसाइटी, भागलपुर चैप्टर के अध्यक्ष प्रो. अशोक कुमार झा, टी.एन.बी. कॉलेज के प्राचार्य प्रो. दीपू महतो, टी.एम.बी.यू. की विभागाध्यक्ष एवं एमबीए निदेशक प्रो. (डॉ.) निर्मला कुमारी, बी.एन. कॉलेज के प्राचार्य प्रो. अनिरुद्ध कुमार, एबीआरसी के वरिष्ठ अनुसंधान अधिकारी डॉ. रंजन कुमार सिन्हा, राजकीय डिग्री कॉलेज अमरपुर के प्राचार्य डॉ. बलीराम प्रसाद सिंह, राजकीय डिग्री कॉलेज पीरपैंती के प्राचार्य डॉ. प्रभात चन्द्र तथा भारतीय स्टेट बैंक की प्रतिनिधि श्रीमती लक्ष्मी मिश्र सहित अनेक विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे।
इसके अतिरिक्त प्रो. देवाशीष सहित देश-विदेश के कई शिक्षाविद् एवं शोधकर्ता ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यम से संगोष्ठी से जुड़े। इससे आयोजन का दायरा राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर वैश्विक संवाद का स्वरूप लेता दिखाई दिया।
महाविद्यालय की अकादमिक सक्रियता का परिचय
कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य एवं संगोष्ठी संयोजक डॉ. राजेश कुमार मिश्र ने की। उन्होंने कहा कि एस.एस.वी. कॉलेज लगातार ऐसे अकादमिक आयोजनों के माध्यम से विद्यार्थियों और शोधार्थियों को समकालीन विषयों से जोड़ने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि इस प्रकार के राष्ट्रीय मंच नवाचार, शोध और ज्ञान के आदान-प्रदान को नई गति प्रदान करते हैं।
संगोष्ठी के सफल आयोजन में आयोजन सचिव डॉ. नमन कुमार, आईक्यूएसी नोडल पदाधिकारी श्री उमा शंकर पासवान तथा संयुक्त आयोजन सचिव डॉ. निकेश कुमार, डॉ. कीर्ति वर्धन गौतम, डॉ. संतोष कुमार एवं डॉ. दिलीप कुमार चौधरी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
शोधपत्रों में उभरे समाधान:
उद्घाटन सत्र के बाद आयोजित तकनीकी सत्र में विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों से आए शोधार्थियों ने सर्कुलर इकोनॉमी, हाइड्रोजन ऊर्जा, पर्यावरण संरक्षण, हरित प्रौद्योगिकी तथा टिकाऊ विकास से जुड़े शोधपत्र प्रस्तुत किए। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. राजकुमार साह एवं प्रो. पवन कुमार सिंह ने की। प्रस्तुत शोधपत्रों में ऊर्जा संकट, कार्बन उत्सर्जन में कमी, औद्योगिक अपशिष्ट प्रबंधन तथा वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के व्यावहारिक समाधान पर विशेष चर्चा हुई।
सहभागिता ने बढ़ाया आयोजन का महत्व:
कार्यक्रम का संचालन डॉ. संतोष कुमार ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन दर्शनशास्त्र विभाग के डॉ. निकेश कुमार ने प्रस्तुत किया। महाविद्यालय के प्राध्यापकों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों की सक्रिय भागीदारी ने आयोजन को उत्साहपूर्ण और सफल बनाया।
हरित विकास, स्वच्छ ऊर्जा और नवाचार जैसे विषयों पर केंद्रित यह राष्ट्रीय संगोष्ठी केवल एक शैक्षणिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान की दिशा में सामूहिक चिंतन का प्रभावशाली मंच बनकर उभरी। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे विमर्श भविष्य की नीतियों, शोध कार्यों और समाज में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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