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गाथा का स्वर्णिम अध्याय, रफ्तार अभी भी धीमी

@ विश्व को ज्ञान देने वाला महाविहार आज भी पहचान की प्रतीक्षा में; केंद्रीय विश्वविद्यालय की निर्माण से बदलेगी तस्वीर?

प्रदीप विद्रोही

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भागलपुर। अंग की ऐतिहासिक धरती पर गंगा किनारे बसे विक्रमशिला महाविहार की पहचान आज भी नालंदा की चमक के पीछे धुंधली दिखाई देती है। कभी तिब्बत, नेपाल, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया तक भारतीय ज्ञान की ज्योति पहुंचाने वाला यह विश्वविख्यात विश्वविद्यालय आज अपने गौरव की पुनर्स्थापना की राह देख रहा है।
जब देश अपनी प्राचीन शिक्षा परंपरा को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नालंदा को केंद्र में रखकर भारत के बौद्धिक इतिहास की पूरी तस्वीर नहीं देखी जा सकती। विक्रमशिला भी उसी गौरवशाली परंपरा का ऐसा स्तंभ है, जिसने एशिया की बौद्धिक चेतना को गहराई से प्रभावित किया।
बजट में बढ़ा फोकस, लेकिन ज़मीन पर रफ्तार धीमी
केंद्र सरकार के वर्ष 2025-26 के बजट में सांस्कृतिक विरासत संरक्षण और पर्यटन विकास पर विशेष जोर दिया गया है। बौद्ध सर्किट और आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की योजनाओं से विक्रमशिला जैसे ऐतिहासिक स्थलों के लिए नए अवसर बने हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि घोषणाओं के साथ तेज़ी से क्रियान्वयन भी जरूरी है।
इतिहास में क्यों छूट गया विक्रमशिला:
इतिहासकारों के अनुसार विक्रमशिला को वह स्थान नहीं मिल पाया, जिसका वह वास्तविक हकदार था। पाठ्यपुस्तकों में सीमित उल्लेख, शोध और संरक्षण की कमी तथा पर्यटन विकास में अपेक्षित प्रयास न होने से यह महाविहार धीरे-धीरे जनचर्चा से दूर होता गया।
ज्ञान का ऐसा विश्वविद्यालय, जहां प्रवेश भी था कठिन:
आठवीं शताब्दी में पाल सम्राट धर्मपाल द्वारा स्थापित विक्रमशिला केवल बौद्ध शिक्षा का केंद्र नहीं था। यहां दर्शन, न्याय, व्याकरण, चिकित्सा, साहित्य और वज्रयान बौद्ध परंपरा का उच्चस्तरीय अध्ययन होता था। महाविहार के छह द्वारों पर विद्वान द्वार-पंडित विद्यार्थियों की मौखिक परीक्षा लेकर ही प्रवेश देते थे। यह व्यवस्था उस दौर की उत्कृष्ट शैक्षणिक गुणवत्ता का प्रतीक मानी जाती थी।
दुनिया को दिए महान आचार्य:
विक्रमशिला के सबसे प्रसिद्ध विद्वानों में आचार्य दीपंकर श्रीज्ञान ‘अतिश’ का नाम प्रमुख है। उन्होंने तिब्बत जाकर बौद्ध धर्म को नई दिशा दी। आज भी तिब्बती बौद्ध परंपरा में विक्रमशिला और अतिश का अत्यंत सम्मान के साथ स्मरण किया जाता है।
केंद्रीय विश्वविद्यालय से बढ़ी उम्मीद:
प्रस्तावित विक्रमशिला केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की दिशा में अब प्रशासनिक गतिविधियां तेज हुई हैं। जिला प्रशासन ने भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को मिशन मोड में चलाते हुए 15 जुलाई तक इसे पूरा करने का लक्ष्य तय किया है। अधिकारियों को समयसीमा के भीतर कार्य पूरा करने और प्रभावित रैयतों को समयबद्ध मुआवजा देने के निर्देश दिए गए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विश्वविद्यालय को बौद्ध अध्ययन, भारतीय दर्शन, पुरातत्व, प्राच्य भाषाओं और अंतरराष्ट्रीय शोध का केंद्र बनाया गया, तो यह केवल बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की शैक्षणिक प्रतिष्ठा को नई ऊंचाई दे सकता है।
इतिहास के साथ न्याय का समय:
नालंदा और विक्रमशिला किसी प्रतिस्पर्धा के प्रतीक नहीं हैं। दोनों भारत की ज्ञान परंपरा के ऐसे गौरवशाली स्तंभ हैं, जिन्होंने विश्व को शिक्षा, दर्शन और संस्कृति की अमूल्य धरोहर दी। आवश्यकता इस बात की है कि विक्रमशिला को केवल पुरातात्विक स्मारक नहीं, बल्कि भारत की जीवंत बौद्धिक विरासत के रूप में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह सम्मान मिले, जिसकी वह सदियों से प्रतीक्षा कर रहा है।

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