


भागलपुर। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर में आयोजित 31वीं अनुसंधान परिषद बैठक (आरसीएम-खरीफ 2026) के प्रथम दिन कृषि अनुसंधान की भावी दिशा, जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा किसानों की आय एवं पोषण सुरक्षा को मजबूत बनाने से जुड़े विभिन्न विषयों पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया। कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में देश के विभिन्न प्रतिष्ठित कृषि संस्थानों से आए विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं तथा विश्वविद्यालय के 300 से अधिक वैज्ञानिकों ने भाग लिया।
बैठक की शुरुआत निदेशक अनुसंधान डॉ. अनिल कुमार सिंह के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने विश्वविद्यालय की अनुसंधान उपलब्धियों, विकसित प्रौद्योगिकियों, नई किस्मों, पेटेंट, कॉपीराइट, स्टार्टअप गतिविधियों तथा आगामी अनुसंधान कार्यक्रमों की जानकारी दी। इस अवसर पर “कृषि विकास की नई उड़ान – बीएयू सबौर के साथ” विषय पर आधारित लघु फिल्म का प्रदर्शन किया गया। साथ ही खरीफ-2026 एजेंडा नोट्स, तकनीकी कार्यक्रम, वार्षिक अनुसंधान प्रतिवेदन 2025-26 तथा बीएयू रिसर्च क्रॉनिकल का विमोचन किया गया।
आईसीएआर, नई दिल्ली के सहायक महानिदेशक (अंतरराष्ट्रीय संबंध) डॉ. नवीन प्रकाश सिंह ने कहा कि विकसित किस्में, पेटेंट, स्टार्टअप और नवाचार तभी सार्थक हैं जब उनका प्रत्यक्ष लाभ किसानों की आय, पोषण सुरक्षा, रोजगार सृजन और ग्रामीण विकास में दिखाई दे। उन्होंने कृषि अनुसंधान को रिमोट सेंसिंग, फसल विविधीकरण, तकनीकी नवाचार और ग्रामीण परिवर्तन से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
गन्ना अनुसंधान संस्थान, पूसा के निदेशक डॉ. देवेंद्र सिंह ने कृषि यंत्रीकरण को समय की आवश्यकता बताते हुए छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए उपयोगी और किफायती कृषि यंत्र विकसित करने पर जोर दिया। उन्होंने फसल प्रजनन एवं किस्म विकास में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के उपयोग की संभावनाओं पर प्रकाश डाला तथा मृदा स्वास्थ्य संरक्षण के लिए हरित खाद फसलों के प्रयोग को बढ़ावा देने की बात कही।
पद्मश्री डॉ. बी. एस. धिल्लों, पूर्व कुलपति, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने बिहार कृषि विश्वविद्यालय की उपलब्धियों की सराहना करते हुए कहा कि बिहार कृषि एवं बागवानी विविधता से समृद्ध राज्य है। उन्होंने खाद्य एवं पोषण सुरक्षा तथा किसानों की समृद्धि के लिए अनुसंधान को और अधिक प्रभावी बनाने का आह्वान किया।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव और बढ़ती जनसंख्या की चुनौतियों के बीच कृषि वैज्ञानिकों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। उन्होंने गुणवत्तायुक्त बीज उत्पादन, फलों एवं सब्जियों के वैज्ञानिक प्रबंधन तथा किसानों की आय बढ़ाने वाली तकनीकों के विकास पर विशेष बल दिया।
बैठक में बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय की डॉ. अर्चना कुमारी, आईसीएआर-सीआईएसएच लखनऊ के डॉ. दिनेश कुमार तथा मैसूर विश्वविद्यालय की पूर्व वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. असना उरोज सहित कई विशेषज्ञों ने भी अपने विचार रखे। विशेषज्ञों ने जलवायु-सहिष्णु एवं पोषण-संपन्न किस्मों के विकास, कृषि प्रसंस्करण, महिला सशक्तिकरण और बहुविषयक अनुसंधान को बढ़ावा देने पर जोर दिया।
तकनीकी सत्रों में बिहार के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों से संबंधित अनुसंधान प्राथमिकताओं, मौसमीय परिस्थितियों तथा फसल सुधार कार्यक्रमों पर विस्तृत चर्चा की गई। जलवायु-स्मार्ट कृषि, एआई आधारित अनुसंधान, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, स्टार्टअप, मूल्य संवर्धन और किसानों तक तकनीक हस्तांतरण जैसे विषय बैठक के प्रमुख केंद्र रहे।
बैठक में यह निष्कर्ष सामने आया कि भविष्य का कृषि अनुसंधान केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि किसानों की आय, पोषण सुरक्षा, संसाधन संरक्षण, रोजगार सृजन और ग्रामीण विकास को भी समान रूप से प्राथमिकता देगा। परिषद की बैठक का दूसरा दिन 20 जून को आयोजित होगा, जिसमें विभिन्न अनुसंधान समूहों की शेष प्रस्तुतियों और तकनीकी सत्रों के माध्यम से खरीफ-2026 की अनुसंधान रणनीति को अंतिम रूप दिया जाएगा।















