


@ गंगा मुक्ति आंदोलन के राष्ट्रीय जन संवाद में नदीकर्मियों का ऐलान, विकास के नाम पर नदियों को बांधने की नीति पर भी उठे सवाल।ऑनलाइन जुड़े गंगा मुक्ति आंदोलन के अनिल प्रकाश, नदी घाटी मंच के संयोजक गौतम बंदोपाध्याय और जया मित्र ने भी अपने विचार रखे।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। फरक्का जल समझौते की मियाद पूरी होने के मुहाने पर गंगा मुक्ति आंदोलन ने एक बार फिर नदियों की अविरलता का सवाल राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। शनिवार को शुजागंज के एक होटल में शुरू हुए दो दिवसीय राष्ट्रीय जन संवाद में देश के अलग-अलग हिस्सों से जुटे नदीकर्मियों ने साफ शब्दों में कहा – फरक्का पर नई संधि नहीं, बल्कि फरक्का बराज समेत नदियों पर बने बांध-बराज को हटाने की दिशा में कदम उठना चाहिए।
गंगा मुक्ति आंदोलन के बैनर तले आयोजित इस संवाद की अध्यक्षता मुजफ्फरपुर के साथी शाहिद कमाल ने की, जबकि संचालन उदय और महेंद्र यादव ने किया। आंदोलन के राष्ट्रीय समन्वयक राम शरण ने उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और झारखंड से पहुंचे नदीकर्मियों का स्वागत किया।

वरिष्ठ समाज एवं संस्कृति कर्मी उदय ने जन संवाद की भूमिका रखते हुए कहा कि आंदोलन केवल फरक्का के खिलाफ नहीं रहा है, बल्कि देश-दुनिया में नदियों को बांधने वाली विकास की सोच का विरोध करता रहा है।
संवाद में वर्तमान विकास नीति और जलवायु संकट पर भी गंभीर चर्चा हुई। प्रतिभागियों ने कहा कि पर्यावरण किसी एक देश या क्षेत्र की सीमा में बंधा विषय नहीं है। नेपाल में सामने आ रही प्राकृतिक विभीषिका को भी ग्लोबल वार्मिंग और बदलते पर्यावरणीय संतुलन के संदर्भ में देखा गया। वक्ताओं ने कहा कि मनुष्य अपनी सुविधा के मुताबिक प्रकृति को नियंत्रित नहीं कर सकता। इसके बावजूद बिजली उत्पादन और विकास के नाम पर पहाड़ी नदियों पर लगातार बड़े बांध बनाए जा रहे हैं। इन परियोजनाओं का असर सिर्फ बांध वाले इलाके तक सीमित नहीं रहता, बल्कि निचले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को बाढ़, सुखाड़, भूस्खलन और अन्य आपदाओं के रूप में इसकी कीमत चुकानी पड़ती है।
कोसी क्षेत्र में सक्रिय नदी वैज्ञानिक महेंद्र यादव ने भारत और बांग्लादेश के बीच फरक्का बराज को लेकर हुए जल समझौते का संदर्भ प्रतिभागियों के सामने रखा। इसके बाद जन संवाद में मौजूद प्रतिभागियों ने एक स्वर से मांग उठाई कि जलसंधि की अवधि पूरी होने के बाद कोई नई संधि नहीं की जानी चाहिए। उनका कहना था कि फरक्का बराज समेत नदियों पर बने तमाम बांध और बराज हटाए जाएं, ताकि नदियां फिर से स्वाभाविक और अविरल रूप से बह सकें।
ऑनलाइन जुड़े गंगा मुक्ति आंदोलन के अनिल प्रकाश, नदी घाटी मंच के संयोजक गौतम बंदोपाध्याय और जया मित्र ने भी अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि नदियों को बांधकर केवल जलधारा को नहीं रोका जा रहा, बल्कि नदी पर निर्भर जीवन, जीव-जंतु और पूरी सभ्यता के प्राकृतिक तंत्र को प्रभावित किया जा रहा है।
वक्ताओं के अनुसार हिमालय से लेकर गंगा के मैदानी क्षेत्र तक गंगा और उसकी सहायक नदियों पर करीब 1200 छोटे-बड़े बांध और बराज बनाए जा चुके हैं। इनके कारण नदियों का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हुआ है। नदी में रहने वाले जीव-जंतुओं का आवास, उनका आवागमन और नदी का प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र भी प्रभावित हुआ है।
जन संवाद में यह बात प्रमुखता से उभरी कि नदियों को बचाने की लड़ाई महज पानी बचाने की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह जीवन, पर्यावरण और भविष्य बचाने की लड़ाई है। प्रतिभागियों ने कहा कि जब तक नदियों की अविरलता बहाल नहीं होगी, तब तक बाढ़ और सुखाड़ जैसी समस्याओं का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

इस अवसर पर नदी बचाओ-जीवन बचाओ आंदोलन, बंगाल के तापस दास, कोसी क्षेत्र में कार्यरत उत्तर प्रदेश के सक्रियकर्मी महेंद्र यादव, रत्ना और डॉ. योगेंद्र सहित कई लोगों ने अपनी बातें रखीं।
कार्यक्रम में योगेंद्र सहनी, निर्मल, गौतम कुमार, नरेश सिंह, रोहित कुमार, अनिरुद्ध, कुमार कृष्णन, मो. बाकिर और मनोज मीता समेत कई नदीकर्मी मौजूद रहे।
















