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के बीच तड़प रही है गांगेय डॉल्फिन की दुनिया!

प्रदीप विद्रोही

भागलपुर। विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभयारण्य इन दिनों एक नए संकट को लेकर चर्चा में है। गंगा नदी में राष्ट्रीय जलमार्ग के विस्तार के साथ बड़े-बड़े मालवाहक जहाजों की आवाजाही तेजी से बढ़ी है। विकास की इस रफ्तार के बीच अब सवाल उठने लगे हैं कि कहीं यह बढ़ता जल परिवहन गंगा की दुर्लभ गांगेय डॉल्फिनों के अस्तित्व पर भारी तो नहीं पड़ रहा।
1991 में अधिसूचित हुए विक्रमशिला गंगा डॉल्फ़िन सैंक्चुअरी में पिछले एक दशक में मानवीय गतिविधियाँ तेजी से बढ़ी हैं, जिससे डॉल्फ़िन इस जगह से दूर जा रहे हैं। गंगा नदी के 60 कि.मी. के इस सैंक्चुअरी क्षेत्र में कई बड़े पुल बन रहे हैं और टूट के गिर रहे हैं। मई में एक बड़े पुल के गिरने की वजह से नावों और जहाज़ों का परिचालन काफी बढ़ गया है।वन विभाग इस सैंक्चुअरी में डॉल्फ़िन की सुरक्षा के लिए मछुआरों को जिम्मेदार मानता है, जबकि हाल के दिनों में निर्माण, नौवहन और औद्योगिक कचरे से डॉल्फ़िन पर खतरा बढ़ा है

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भागलपुर स्थित विक्रमशिला सेतु ध्वस्त होने के बाद से इस इलाके में बड़े मालवाहक जहाजों का परिचालन बदस्तूर जारी है। सुल्तानगंज से कहलगांव और बटेश्वर स्थान तक गंगा नदी का 55 किलोमीटर लंबा क्षेत्र 1991 में विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य के रूप में अधिसूचित किया गया था। यह एशिया में लुप्तप्राय गंगा डॉल्फिन के लिए संरक्षित क्षेत्र है। यह अभयारण्य देश में गंगा डॉल्फिन संरक्षण का अहम केंद्र माना जाता है।
डॉल्फिन रिसर्च सेंटर, पटना के निदेशक डॉ. गोपाल शर्मा बताते हैं कि वर्ष 2018 में हुए सर्वेक्षण के अनुसार इस क्षेत्र में करीब 150 से 180 डॉल्फिन की उपस्थिति दर्ज की गई थी। इसके बाद कोई नया सर्वे नहीं हुआ है, इसलिए ताजा आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा गंगा डॉल्फिन के लिए एंबुलेंस सेवा शुरू करने के निर्णय से इस अभयारण्य में बची हुई डॉल्फिनों के जीवन और संरक्षण को नई उम्मीद मिल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रयास इनके संरक्षण और वंश वृद्धि में कारगर साबित हो सकता है। हालांकि, यह योजना अभी धरातल पर पूरी तरह लागू नहीं हो पाई है।
सुल्तानगंज से कहलगांव और बटेश्वर स्थान तक गंगा नदी की शांत जलधारा में कभी सहज रूप से उछलती दिखाई देने वाली डॉल्फिन अब लगातार बढ़ते जहाजों के शोर और कंपन के बीच अपने अस्तित्व की जंग लड़ती नजर आ रही हैं। स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में नदी का स्वरूप तेजी से बदला है। जहां पहले सीमित संख्या में नावें दिखाई देती थीं, वहीं अब भारी मालवाहक जहाज गंगा की धारा को चीरते हुए गुजरते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, गंगा डॉल्फिन सामान्य जीवों की तरह केवल आंखों पर निर्भर नहीं रहती। वह पानी के भीतर ध्वनि संकेतों यानी इकोलोकेशन के जरिए रास्ता पहचानती है, शिकार खोजती है और अपने समूह से संपर्क बनाए रखती है। ऐसे में जहाजों के इंजन से निकलने वाला तीव्र शोर उनकी प्राकृतिक गतिविधियों में बाधा पैदा कर सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि लगातार ध्वनि प्रदूषण के कारण डॉल्फिन तनावग्रस्त हो सकती हैं, उनका भोजन खोजने का तरीका प्रभावित हो सकता है और वे अपने सुरक्षित क्षेत्रों से दूर भी जा सकती हैं।
खतरा केवल शोर तक सीमित नहीं है। तेज गति से चलने वाले बड़े जहाजों से डॉल्फिन के घायल होने या टकराने की आशंका भी बनी रहती है। कई पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में डॉल्फिन की संख्या पर इसका गंभीर असर दिखाई दे सकता है।
हालांकि प्रशासन और वन विभाग की ओर से अभयारण्य क्षेत्र में समय-समय पर जागरूकता और निगरानी अभियान चलाए जाते रहे हैं। लेकिन अब विशेषज्ञ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि बदलती परिस्थितियों के बीच केवल जागरूकता पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए लगातार वैज्ञानिक अध्ययन, ध्वनि स्तर की मॉनिटरिंग और डॉल्फिन के व्यवहार पर शोध जरूरी है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का सुझाव है कि अभयारण्य क्षेत्र में मालवाहक जहाजों की गति तय सीमा के भीतर रखी जाए, कम शोर वाली इंजन तकनीक को बढ़ावा दिया जाए और संवेदनशील इलाकों में विशेष निगरानी व्यवस्था लागू की जाए। उनका मानना है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों साथ-साथ चल सकते हैं, बशर्ते योजनाओं में प्रकृति को बराबर महत्व दिया जाए। लेकिन आज इन प्रतिबंधित गंगा धार में दर्जनों ट्रिप बड़े जहाज की आवाजाही हो रही है।
गंगा की डॉल्फिन केवल एक जलीय जीव नहीं, बल्कि नदी की सेहत का संकेत मानी जाती है। ऐसे में सवाल सिर्फ एक प्रजाति के संरक्षण का नहीं, बल्कि गंगा के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने का है। अब देखना यह होगा कि विकास की तेज रफ्तार के बीच गंगा की यह दुर्लभ मुस्कान कितनी सुरक्षित रह पाती है।

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