


नवगछिया। आधुनिकता के दौर में जहां कई पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं, वहीं गोसाई गांव में वर्षों से चली आ रही एक अनूठी परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ जीवंत है। कुशग्रहणी अमावस्या के अवसर पर शुक्रवार को गांव के कई दर्जन लोग एक साथ कुश उखाड़ने के लिए पहुंचे। ग्रामीणों ने परंपरा के अनुसार कुश उखाड़ी और उसे अपने घर लेकर आए।
गांव के लोगों का कहना है कि कुशग्रहणी अमावस्या के दिन कुश उखाड़ने की यह परंपरा कोई नई नहीं है। यह वर्षों से उनके पूर्वजों द्वारा निभाई जाती रही है और आज भी उसी परंपरा को ग्रामीण आगे बढ़ा रहे हैं। खास बात यह है कि इसमें केवल बुजुर्ग ही नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के लोग भी शामिल होते हैं। यही वजह है कि बदलते समय के बावजूद यह परंपरा आज भी गोसाई गांव में पूरी तरह जीवंत नजर आती है।

कुश का सनातन धर्म में विशेष महत्व माना गया है। पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान, संकल्प, तर्पण, श्राद्ध और पितृकर्म सहित विभिन्न धार्मिक कार्यों में इसका उपयोग किया जाता है। कुशग्रहणी अमावस्या के दिन कुश ग्रहण करने की परंपरा को धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
सेवानिवृत्त शिक्षक अनिल कुमार झा ने कहा कि गोसाई गांव में कुश उखाड़ने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। यह केवल धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। खुशी की बात है कि आज भी गांव के दर्जनों लोग एक साथ इस परंपरा में शामिल होते हैं।

शिक्षक कालीचरण मिश्र ने कहा कि समय बदलने के बावजूद परंपरा का जीवित रहना गांव की सांस्कृतिक मजबूती को दर्शाता है। ऐसी परंपराएं हमारी नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों और अपनी संस्कृति से जोड़ने का काम करती हैं।
शिक्षक रजनीश बौआ ने कहा कि कुश सनातन परंपरा में पवित्र मानी गई है। कुशग्रहणी अमावस्या पर कुश उखाड़ने की परंपरा आज भी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। यह हमारी आस्था के साथ-साथ गांव की वर्षों पुरानी पहचान भी है।
ग्रामीणों का कहना है कि हर वर्ष कुशग्रहणी अमावस्या के अवसर पर गांव के लोग एकजुट होकर कुश उखाड़ने जाते हैं। सामूहिक रूप से इस परंपरा को निभाने से जहां धार्मिक आस्था मजबूत होती है, वहीं गांव के लोगों के बीच आपसी जुड़ाव और अपनापन भी बढ़ता है। ग्रामीणों का संकल्प है कि आने वाले वर्षों में भी इस परंपरा को उसी उत्साह और श्रद्धा के साथ जारी रखा जाएगा।
इस अवसर पर ग्रामीणों में पंडित राधाकृष्ण झा, गया झा, टिंकू झा, बमबम झा, पंडित सुमन झा,बरुण कुमार झा, अनिल झा, चंदन झा, सहित कई दर्जन ग्रामीण मौजूद रहे।















