


@ मछुआ टोली, पटना के शिवभक्तों ने तैयार की अनोखी कांवर; बोले – संसार के सभी जीव-जंतु भगवान भोले के अपने हैं।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। सावन के पावन महीने में शिवभक्ति के अलग-अलग रंग देखने को मिल रहे हैं। कांवर यात्रा पथ में कहीं कांवरियों की लंबी कतार आस्था का संदेश दे रही है तो कहीं आकर्षक और अनोखी कांवर लोगों का ध्यान खींच रही है। इसी क्रम में मछुआ टोली, पटना के शिवभक्तों द्वारा तैयार की गई एक अद्भुत कांवर इन दिनों लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इस कांवर में भगवान महाकाल की प्रतिमा को कछुए की आकृति के साथ बेहद कलात्मक ढंग से सजाया गया है। कांवर के माध्यम से श्रद्धा के साथ-साथ प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया गया है।

इस अनोखी कांवर में कछुए को आधार बनाकर उसके ऊपर भगवान महाकाल का स्वरूप स्थापित किया गया है। कांवर की सजावट में प्रकृति से जुड़े विभिन्न तत्वों को स्थान दिया गया है, जिससे यह केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि जीव-जंतुओं और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता का संदेश भी देती नजर आती है।
कांवर तैयार करने वाले शिवभक्तों का कहना है कि भगवान शिव को प्रकृति और समस्त जीव-जगत से जोड़कर देखा जाता है। शिव के स्वरूप में जहां पशु-पक्षियों और प्राकृतिक शक्तियों का विशेष महत्व दिखाई देता है, वहीं कछुआ भी प्रकृति के महत्वपूर्ण जीवों में शामिल है। इसी सोच को कांवर के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है।
भगवान भोलेनाथ के अपने हैं। इसलिए मनुष्य का दायित्व है कि वह प्रकृति के साथ-साथ पशु-पक्षियों और जलीय जीवों की भी रक्षा करे। उनका कहना है कि यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी मानव जीवन भी सुरक्षित रह सकेगा।
मछुआ टोली के शिवभक्तों द्वारा तैयार की गई इस कांवर को देखने के लिए रास्ते में लोगों की नजरें ठहर जा रही हैं। सामान्य कांवर से अलग इसकी बनावट और विषय-वस्तु लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। भगवान महाकाल का स्वरूप और कछुए की आकृति का संयोजन भक्तों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
कांवरियों का कहना है कि कांवर यात्रा केवल जल लेकर भगवान शिव के मंदिर तक पहुंचने की धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से समाज को सकारात्मक संदेश भी दिया जा सकता है। इसी उद्देश्य से इस बार ऐसी कांवर तैयार करने का विचार आया, जिसमें शिवभक्ति के साथ पर्यावरण और जीव संरक्षण की भावना भी जुड़ी हो।
भक्तों के अनुसार भगवान शिव का स्वरूप हमें सादगी, प्रकृति और सभी प्राणियों के प्रति करुणा का संदेश देता है। कछुए को कांवर में प्रमुखता देने के पीछे भी यही भावना है कि लोग जलीय जीवों और अन्य वन्यजीवों के संरक्षण को लेकर जागरूक हों। उन्होंने कहा कि आज नदियों में प्रदूषण, जलस्रोतों का घटता स्तर और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव कई जीवों के अस्तित्व के लिए चुनौती बन रहा है। ऐसे में धार्मिक आयोजनों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की बात समाज के बड़े वर्ग तक आसानी से पहुंचाई जा सकती है।
मछुआ टोली, पटना के शिवभक्तों की यह पहल यह दिखाती है कि धार्मिक आस्था और सामाजिक सरोकार एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। भगवान महाकाल को कछुए पर विराजमान दिखाती यह कांवर श्रद्धालुओं के लिए जहां भक्ति का केंद्र बनी है, वहीं पर्यावरण प्रेमियों के लिए भी एक सार्थक संदेश लेकर आई है।भक्तों का स्पष्ट कहना है कि ‘भोलेनाथ केवल मनुष्यों के नहीं, बल्कि संसार के प्रत्येक जीव के भगवान हैं।’ इसलिए पशु-पक्षियों, जलीय जीवों और प्रकृति की रक्षा करना भी शिव के प्रति हमारी श्रद्धा का ही एक रूप है।
कांवर में दिखी प्रकृति की झलक, कछुआ पर सवार महाकाल ने दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश
@ मछुआ टोली, पटना के शिवभक्तों ने तैयार की अनोखी कांवर; बोले – संसार के सभी जीव-जंतु भगवान भोले के अपने हैं।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। सावन के पावन महीने में शिवभक्ति के अलग-अलग रंग देखने को मिल रहे हैं। कांवर यात्रा पथ में कहीं कांवरियों की लंबी कतार आस्था का संदेश दे रही है तो कहीं आकर्षक और अनोखी कांवर लोगों का ध्यान खींच रही है। इसी क्रम में मछुआ टोली, पटना के शिवभक्तों द्वारा तैयार की गई एक अद्भुत कांवर इन दिनों लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इस कांवर में भगवान महाकाल की प्रतिमा को कछुए की आकृति के साथ बेहद कलात्मक ढंग से सजाया गया है। कांवर के माध्यम से श्रद्धा के साथ-साथ प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया गया है।
इस अनोखी कांवर में कछुए को आधार बनाकर उसके ऊपर भगवान महाकाल का स्वरूप स्थापित किया गया है। कांवर की सजावट में प्रकृति से जुड़े विभिन्न तत्वों को स्थान दिया गया है, जिससे यह केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि जीव-जंतुओं और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता का संदेश भी देती नजर आती है।
कांवर तैयार करने वाले शिवभक्तों का कहना है कि भगवान शिव को प्रकृति और समस्त जीव-जगत से जोड़कर देखा जाता है। शिव के स्वरूप में जहां पशु-पक्षियों और प्राकृतिक शक्तियों का विशेष महत्व दिखाई देता है, वहीं कछुआ भी प्रकृति के महत्वपूर्ण जीवों में शामिल है। इसी सोच को कांवर के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है।
भगवान भोलेनाथ के अपने हैं। इसलिए मनुष्य का दायित्व है कि वह प्रकृति के साथ-साथ पशु-पक्षियों और जलीय जीवों की भी रक्षा करे। उनका कहना है कि यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी मानव जीवन भी सुरक्षित रह सकेगा।
मछुआ टोली के शिवभक्तों द्वारा तैयार की गई इस कांवर को देखने के लिए रास्ते में लोगों की नजरें ठहर जा रही हैं। सामान्य कांवर से अलग इसकी बनावट और विषय-वस्तु लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। भगवान महाकाल का स्वरूप और कछुए की आकृति का संयोजन भक्तों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
कांवरियों का कहना है कि कांवर यात्रा केवल जल लेकर भगवान शिव के मंदिर तक पहुंचने की धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से समाज को सकारात्मक संदेश भी दिया जा सकता है। इसी उद्देश्य से इस बार ऐसी कांवर तैयार करने का विचार आया, जिसमें शिवभक्ति के साथ पर्यावरण और जीव संरक्षण की भावना भी जुड़ी हो।
भक्तों के अनुसार भगवान शिव का स्वरूप हमें सादगी, प्रकृति और सभी प्राणियों के प्रति करुणा का संदेश देता है। कछुए को कांवर में प्रमुखता देने के पीछे भी यही भावना है कि लोग जलीय जीवों और अन्य वन्यजीवों के संरक्षण को लेकर जागरूक हों। उन्होंने कहा कि आज नदियों में प्रदूषण, जलस्रोतों का घटता स्तर और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव कई जीवों के अस्तित्व के लिए चुनौती बन रहा है। ऐसे में धार्मिक आयोजनों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की बात समाज के बड़े वर्ग तक आसानी से पहुंचाई जा सकती है।
मछुआ टोली, पटना के शिवभक्तों की यह पहल यह दिखाती है कि धार्मिक आस्था और सामाजिक सरोकार एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। भगवान महाकाल को कछुए पर विराजमान दिखाती यह कांवर श्रद्धालुओं के लिए जहां भक्ति का केंद्र बनी है, वहीं पर्यावरण प्रेमियों के लिए भी एक सार्थक संदेश लेकर आई है।भक्तों का स्पष्ट कहना है कि ‘भोलेनाथ केवल मनुष्यों के नहीं, बल्कि संसार के प्रत्येक जीव के भगवान हैं।’ इसलिए पशु-पक्षियों, जलीय जीवों और प्रकृति की रक्षा करना भी शिव के प्रति हमारी श्रद्धा का ही एक रूप है।
















