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@ स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के दौर में भी कायम है रेडियो का भरोसा, किसानों तक वैज्ञानिक सलाह पहुंचाने वाले बीएयू सबौर के सामुदायिक रेडियो को मिला राष्ट्रीय सम्मान।

प्रदीप विद्रोही

भागलपुर। जहां एक ओर स्मार्टफोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने सूचना की दुनिया को बदल दिया है, वहीं बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) सबौर का सामुदायिक रेडियो यह साबित कर रहा है कि भरोसेमंद और स्थानीय संवाद की ताकत आज भी रेडियो के पास है। खेत-खलिहानों से लेकर गांव की चौपाल तक पहुंचने वाला एफएम ग्रीन अब केवल प्रसारण का माध्यम नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास की मजबूत आवाज बन चुका है।
राष्ट्रीय प्रसारण दिवस (23 जुलाई) के अवसर पर बीएयू के सामुदायिक रेडियो की उपलब्धियां इसकी प्रासंगिकता को और मजबूत करती हैं। विश्वविद्यालय के अंतर्गत सबौर, गया, बाढ़ (पटना) और कटिहार में संचालित चार सामुदायिक रेडियो स्टेशन प्रतिदिन कृषि, पशुपालन, मौसम, स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला सशक्तीकरण और लोकसंस्कृति से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं।
इन कार्यक्रमों का सबसे बड़ा लाभ किसानों को मिल रहा है। मौसम आधारित वैज्ञानिक सलाह, नई कृषि तकनीक और विशेषज्ञों की जानकारी समय पर मिलने से खेती अधिक लाभकारी बन रही है। रेडियो प्रतिनिधि गांव-गांव जाकर किसानों, महिलाओं, स्वयं सहायता समूहों और युवाओं की आवाज रिकॉर्ड करते हैं, जिससे यह मंच केवल सूचना नहीं, बल्कि संवाद का माध्यम भी बन गया है।
बीएयू के सामुदायिक रेडियो केंद्र के प्रभारी ईश्वर चंद्रा के अनुसार, उत्कृष्ट प्रसारण के लिए एफएम ग्रीन, सबौर को वर्ष 2023 का राष्ट्रीय सामुदायिक रेडियो पुरस्कार प्राप्त हुआ। वहीं वर्ष 2025 में मुंबई में आयोजित वर्ल्ड ऑडियो विजुअल एंड एंटरटेनमेंट समिट में केवीके बाढ़ को स्वर्ण पदक तथा एफएम ग्रीन को सर्वश्रेष्ठ ग्रामीण विकास अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
मुंबई में आयोजित कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बीएयू के सामुदायिक रेडियो प्रतिनिधियों से संवाद कर ग्रामीण विकास में उनकी भूमिका की सराहना की थी।
रेडियो की विरासत भी उतनी ही समृद्ध है। 23 जुलाई 1927 को देश में पहला नियमित रेडियो प्रसारण शुरू हुआ था। वर्ष 1936 में ऑल इंडिया रेडियो की स्थापना हुई और 1956 में इसे आकाशवाणी नाम मिला। आजादी के आंदोलन से लेकर आपदा प्रबंधन और अब ग्रामीण विकास तक रेडियो ने हर दौर में अपनी उपयोगिता साबित की है।
बीएयू के कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह का कहना है कि सूचनाओं की भीड़ के इस दौर में सामुदायिक रेडियो भरोसेमंद, स्थानीय और जनोन्मुखी सूचना का सबसे प्रभावी माध्यम बनकर उभरा है। यह किसानों का सलाहकार, महिलाओं का साथी, युवाओं का मार्गदर्शक और समाज का जीवंत संवाद मंच है। यही कारण है कि डिजिटल युग में भी रेडियो की आवाज पहले की तरह लोगों के दिलों तक पहुंच रही है।

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