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योग को प्रायः लोग केवल आसन और प्राणायाम तक सीमित समझते हैं, जबकि योग शरीर, मन और आत्मा के बीच सामंजस्य स्थापित करने की एक संपूर्ण जीवन पद्धति है। योग का वास्तविक अर्थ है ठहराव—वह ठहराव जो जीवन की भागदौड़, तनाव, चिंता, क्रोध और अवसाद के बीच हमें आंतरिक शांति प्रदान करता है।

आज का मनुष्य निरंतर व्यस्तता और प्रतिस्पर्धा में उलझा हुआ है। परिणामस्वरूप मानसिक अशांति, तनाव और अनेक शारीरिक-मानसिक रोग बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे समय में योग हमें संतुलित और सार्थक जीवन जीने की दिशा दिखाता है।

महर्षि पतंजलि ने योग को अष्टांग योग के रूप में परिभाषित किया है, जिसमें जीवन को संतुलित और अनुशासित बनाने वाले आठ चरण बताए गए हैं।

यम : व्यवहार का ठहराव

यम का अर्थ है संयम। परिवार, समाज और मित्रों के बीच रहते हुए हमारा व्यवहार अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), अपरिग्रह (अनावश्यक संग्रह न करना) और ब्रह्मचर्य जैसे सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए। जब व्यक्ति इन मूल्यों का पालन करता है, तब उसके व्यवहार में स्थिरता और संतुलन आता है।

नियम : आचरण का ठहराव

स्वच्छता, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान नियम के अंग हैं। इनका पालन करने से व्यक्ति का चरित्र और आचरण परिष्कृत होता है तथा जीवन में सकारात्मकता आती है।

आसन : शरीर का ठहराव

महर्षि पतंजलि कहते हैं—”स्थिरं सुखम् आसनम्” अर्थात जिस अवस्था में शरीर स्थिर और सुखपूर्वक रह सके, वही आसन है। योग का उद्देश्य कठिन मुद्राएं करना नहीं, बल्कि शरीर को स्वस्थ, संतुलित और सहज बनाना है।

प्राणायाम : सांसों का ठहराव

शरीर और मन के बीच सांस एक सेतु का कार्य करती है। गहरी और नियंत्रित श्वास से मन शांत होता है, तनाव कम होता है और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। प्राणायाम साधना के अगले चरणों की तैयारी करता है।

प्रत्याहार : इंद्रियों का ठहराव

मनुष्य की इंद्रियां उसे बाहरी संसार की ओर आकर्षित करती हैं। प्रत्याहार का अर्थ है आवश्यकतानुसार इंद्रियों का उपयोग करना और उन्हें अनियंत्रित भटकाव से बचाना। इससे मन भीतर की ओर उन्मुख होता है।

धारणा : मन का ठहराव

जब मन असंख्य विचारों से मुक्त होकर किसी एक लक्ष्य, विचार या स्मरण पर केंद्रित होने लगता है, तो उसे धारणा कहते हैं। यह ध्यान की प्रारंभिक अवस्था है।

ध्यान : चेतना का ठहराव

ध्यान वह अवस्था है, जहां मन विचारों के शोर से मुक्त होकर पूर्ण जागरूकता में स्थित होता है। इसमें व्यक्ति स्वयं के भीतर स्थित शांति और चेतना का अनुभव करता है।

समाधि : परम ठहराव

समाधि योग की सर्वोच्च अवस्था है। यह वह स्थिति है, जहां साधक पूर्ण एकाग्रता और आत्मबोध के साथ अपने अस्तित्व की गहराई में उतर जाता है। ध्यान जहां प्रयास है, वहीं समाधि ईश्वरीय प्रसाद के समान अनुभव है।

योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, शांत और सार्थक बनाने की प्रक्रिया है। व्यवहार, आचरण, शरीर, श्वास, इंद्रियों, मन और चेतना का पूर्ण ठहराव ही योग का वास्तविक स्वरूप है। यही परम ठहराव हमें आंतरिक आनंद, स्वास्थ्य और आत्मिक शांति की ओर ले जाता है।

लेखक : आचार्य अंशु
समर्थगुरुधारा के वरिष्ठ आचार्य
उपाध्यक्ष, इंडियन योग एसोसिएशन, बिहार चैप्टर

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