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नवगछिया । बिहार विधानसभा चुनाव का माहौल जैसे-जैसे गरमाता जा रहा है, भागलपुर जिले की बिहपुर विधानसभा सीट इस बार राजनीति का केंद्र बनती दिख रही है। लंबे समय से राजद का गढ़ रही यह सीट अब नई दिशा में करवट लेती नजर आ रही है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि इस बार महागठबंधन के सहयोगी दल वीआईपी (विकासशील इंसान पार्टी) को यह सीट मिल सकती है।

बिहपुर की राजनीति हमेशा से जातीय समीकरणों पर टिकी रही है। यादव, मुस्लिम और दलित समुदायों के गठजोड़ ने वर्षों तक राजद को इस सीट पर मजबूत स्थिति में बनाए रखा। लेकिन बीते कुछ वर्षों में सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ तेजी से बदली हैं। अब सवर्ण मतदाताओं का प्रभाव भी काफी बढ़ गया है, जिसने इस बार का चुनावी संतुलन पूरी तरह बदल दिया है।

राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो भाजपा को इस सीट पर अब तक दो ही बार सफलता मिली है। बाकी बार राजद ने ही बाजी मारी है। हालांकि 2015 के बाद से क्षेत्र में जाति के साथ-साथ विकास, बेरोजगारी और अपराध जैसे मुद्दे भी प्रमुख हो गए हैं। मगर इस बार की सबसे दिलचस्प बात यह है कि “सवर्ण बनाम पिछड़ा” का पारंपरिक समीकरण टूटता हुआ दिख रहा है।

अब तक जहां राजद पिछड़े वर्ग और मुस्लिम मतदाताओं के सहारे मैदान में उतरती रही, वहीं भाजपा सवर्ण समुदाय पर निर्भर रही है। लेकिन इस बार हालात उलटते दिखाई दे रहे हैं। भाजपा और वीआईपी दोनों ही दल सवर्ण उम्मीदवार उतारने की रणनीति पर विचार कर रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि वीआईपी, जो महागठबंधन का हिस्सा है, किसी प्रभावशाली सवर्ण चेहरे को उम्मीदवार बना सकती है। यह कदम भाजपा के सवर्ण वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

बिहपुर क्षेत्र में सवर्ण मतदाताओं की संख्या करीब 30 प्रतिशत है, जिनमें ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत समुदाय का असर सबसे अधिक है। यादव और मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 35 प्रतिशत है, जबकि बाकी मतदाता दलित और अति पिछड़े वर्ग से आते हैं। ऐसे में यदि वीआईपी ने सवर्ण प्रत्याशी दिया, तो भाजपा और राजद दोनों के लिए चुनौती बढ़ जाएगी।

सूत्रों के मुताबिक, महागठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर चर्चा अंतिम दौर में है। बताया जा रहा है कि राजद इस सीट को छोड़ना नहीं चाहती थी, लेकिन संतुलन बनाए रखने के लिए इसे वीआईपी के खाते में देने पर सहमति बन सकती है। वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी ने हाल के दिनों में भागलपुर और आसपास के इलाकों में कई बैठकों के जरिए इस सीट पर रणनीति को धार देने की कोशिश की है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार का चुनाव केवल जातीय समीकरणों तक सीमित नहीं रहेगा। विकास, रोजगार और सुरक्षा जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इलाके में बुनियादी ढांचे में सुधार तो हुआ है, लेकिन रोजगार के अवसर अब भी सीमित हैं। यही कारण है कि युवा मतदाता इस बार निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

भाजपा अपने सवर्ण वोटरों को एकजुट रखने और पिछड़ा वर्ग के कुछ हिस्से को जोड़ने की कोशिश में है। दूसरी ओर, यदि वीआईपी ने सवर्ण उम्मीदवार उतारा, तो उसे राजद के परंपरागत मुस्लिम–यादव गठजोड़ का भी लाभ मिल सकता है। यह स्थिति भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है।

वहीं, जनसुराज पार्टी के प्रत्याशी पवन चौधरी भी मैदान में हैं। वे स्थानीय स्तर पर युवाओं के बीच लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं और “परिवर्तन” के नारे के साथ चुनाव में उतर रहे हैं। उनके मैदान में आने से मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।

बिहपुर की राजनीति हमेशा अप्रत्याशित रही है। यहाँ जातीय समीकरण जितनी तेजी से बनते हैं, उतनी ही तेजी से बदल भी जाते हैं। यदि वीआईपी ने सवर्ण उम्मीदवार उतारा, तो महागठबंधन के भीतर असंतोष की लहर उठ सकती है, लेकिन रणनीतिक दृष्टि से यह फैसला महागठबंधन के लिए फायदेमंद भी साबित हो सकता है।

कुल मिलाकर, बिहपुर विधानसभा इस बार भागलपुर जिले की सबसे रोचक और अप्रत्याशित सीट के रूप में उभर रही है। राजद का परंपरागत गढ़ अब सवर्ण समीकरणों की नई बिसात पर खड़ा है। भाजपा अपने आधार को बचाने की कोशिश में है, जबकि वीआईपी नए गठजोड़ के सहारे राजनीतिक संतुलन बदलने के प्रयास में जुटी है। आने वाले दिनों में उम्मीदवारों की घोषणा के साथ तस्वीर और स्पष्ट होगी, लेकिन फिलहाल इतना तय है — बिहपुर की राजनीति इस बार पूरी तरह से नए मोड़ पर है।

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