


जनसंपर्क का ‘लाइफटाइम पैक’ अब भी एक्टिव!
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। राजनीति भी बड़ी अजीब चीज है। यहां टिकट कट सकता है, पार्टी बदल सकती है, निष्कासन का फरमान जारी हो सकता है, लेकिन जनसंपर्क ऐसा अमरबेल है कि एक बार लिपट जाए तो फिर चुनावी मौसम हो या पतझड़, हरा-भरा ही दिखाई देता है। भागलपुर लोकसभा क्षेत्र के तीन पूर्व विधायकों ने साबित कर दिया है कि कुर्सी जा सकती है, लेकिन ‘जनता के बीच सक्रिय’ रहने का सर्टिफिकेट कभी एक्सपायर नहीं होता। जबकि सच तो यह है कि अब इन तीनों की राजनीतिक पारी आने वाले कई वर्षों तक के लिए जमींदोज हो चुकी है।
पिछले विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे, स्थानीय नाराजगी और पार्टी के नए प्रयोगों की आंधी में कहलगांव के पवन यादव, पीरपैंती के ललन कुमार और गोपालपुर के गोपाल मंडल का टिकट उड़ गया। पार्टी ने सोचा कि नया चेहरा उतारकर नई कहानी लिखी जाएगी। कहानी तो लिखी गई, लेकिन दो पुराने किरदारों ने मंच छोड़ने से साफ इनकार कर दिया।
कहलगांव में भाजपा ने गठबंधन धर्म निभाते हुए सीट जदयू को सौंप दी। पवन यादव का टिकट गया और जदयू के शुभानंद मुकेश विधायक बन गए। पीरपैंती में भाजपा ने जनता की नाराजगी का इलाज उम्मीदवार बदलकर किया और ललन कुमार की जगह अमन जैसे अनुभवी को पुणः किनारा करते हुए नए खिलाड़ी मुरारी पासवान को उतार दिया। उधर गोपालपुर में गोपाल मंडल के विवादित बयानों ने शायद पार्टी की धड़कनें इतनी बढ़ा दी थीं कि टिकट ही बदल दिया गया और शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल मैदान में आ गए। ललन के दुलारे बुलो का आना पहले से भी तय था। तीनों नए उम्मीदवार जीत भी गए।
लेकिन राजनीति में हार का मतलब घर बैठना नहीं होता। पवन यादव और गोपाल मंडल ने सोचा कि पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो जनता ही फैसला करेगी। दोनों निर्दलीय मैदान में उतर गए। जनता ने फैसला भी कर दिया—इतना साफ कि चुनाव परिणाम के बाद ईवीएम भी शायद शर्मा रही होगी। बोले तो दोनों की भद्द पीट गई। ललन कुमार ने चुनाव लड़ने की बजाय राजनीतिक फिटनेस बनाए रखने के लिए सीधा राजद की जिम जॉइन कर ली।
करीब एक साल बीतने को है, लेकिन इन तीनों नेताओं की सक्रियता अलग – अलग अंदाज में जारी है। जहां दो लोग जुटे, वहां नेता जी की उपस्थिति लगभग सुनिश्चित मानी जा रही है।
बेटिकट होने के बाद ललन आरजेडी कुनबे में जा मिले। फ़िलहाल, ललन ने दो टूक कहा- अभी हम न किसी दल में हैं और न ही निर्दल में। अभी हम समाज सुधार में हैं। ललन कुमार की राजनीति का नया अध्याय सोशल मीडिया पर खूब चस्पा हो रहा है। वे भरपूर ज्ञान बांटते फिर रहे हैं। अब वे ज्यादा फेसबुक और व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय में सक्रिय दिखाई देते हैं। हर मुद्दे पर विचार, हर घटना पर विश्लेषण – डिजिटल जनसंपर्क का यह नया मॉडल तेजी से आगे बढ़ रहा है।
उधर भाजपा से छह साल के लिए निष्कासित किए गए पवन यादव का भाजपा प्रेम भी किसी पुराने फिल्मी प्रेमी जैसा नजर आता है। राजधानी की यात्राएं जारी हैं।
गोपाल मंडल भी अपने पुराने अंदाज में क्षेत्र में सक्रिय हैं। पद नहीं है, लेकिन पहचान बरकरार है। समर्थकों से मुलाकात, जनसमस्याओं पर चर्चा और सामाजिक आयोजनों में उपस्थिति ऐसी है कि कई बार लोगों को याद ही नहीं रहता कि वे फिलहाल विधायक नहीं हैं। राजनीति में सक्रियता का उनका सिद्धांत शायद यही है – चर्चा बनी रहनी चाहिए।’
राजनीतिक जानकार भी इस सक्रियता को बड़े गौर से देख रहे हैं। उनका मानना है कि यह सब जनता के प्रति अचानक उमड़ा प्रेम नहीं, बल्कि अगले चुनाव की एडवांस बुकिंग है। राजनीति में याददाश्त कमजोर मानी जाती है, इसलिए नेताओं को समय-समय पर जनता को याद दिलाना पड़ता है कि हम अभी रिटायर नहीं हुए हैं।
भागलपुर की राजनीति का यह दिलचस्प अध्याय बताता है कि यहां टिकट कट सकता है, दल बदल सकता है, निष्कासन हो सकता है, चुनाव हार सकते हैं, लेकिन जनसंपर्क कभी नहीं टूटता। आखिर लोकतंत्र में जनता ही अंतिम उम्मीद है और अगला टिकट भी। फ़िलहाल, बेटिकट यात्रा जारी है।

















