


प्रदीप विद्रोही
सुल्तानगंज। श्रावणी मेले में हर साल लाखों कांवरिए सुल्तानगंज से जल लेकर बाबा बैद्यनाथ धाम की ओर बढ़ते हैं। कोई पैदल चलता है, कोई दौड़ते हुए डाक बम बनता है, तो कोई दंडवत देकर कठिन तपस्या का मार्ग चुनता है। लेकिन इस बार कांवर पथ पर एक ऐसी अनोखी साधना लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रही है, जिसमें एक शिवभक्त घुटनों के बल बाबा के दरबार तक पहुंचने का संकल्प लेकर निकला है।
ये हैं लखीसराय के सुबोध कुमार सिंह। सुबोध कोई पहली बार कठिन यात्रा नहीं कर रहे हैं। वे अब तक नौ बार दंडवत यात्रा कर बाबा बैद्यनाथ धाम पहुंच चुके हैं। इस बार उन्होंने घुटनों के बल पूरी यात्रा करने का संकल्प लिया है।
सुबोध कहते हैं, “बाबा जिस रूप में बुलाते हैं, भक्त उसी रूप में निकल पड़ता है। यह यात्रा मनुष्य नहीं, बाबा की इच्छा तय करती है।”
उनके मुताबिक दंडवत यात्रा के दौरान उन्हें देवघर पहुंचने में 20 से 25 दिन लग जाते थे। इस बार कितने दिन लगेंगे, इसका अनुमान उन्हें भी नहीं है। वह मुस्कुराते हुए कहते हैं, “यह तय मैं नहीं करता, बाबा करते हैं। जब उनकी इच्छा होगी, तब उनके दरबार तक पहुंच जाऊंगा।”
श्रावणी मेले के दूसरे ही दिन उनकी घुटनों के बल यात्रा का दूसरा चरण पूरा हो चुका है। रास्ते में मिलने वाले श्रद्धालु उन्हें देखकर रुक जाते हैं। कोई जल पिलाता है, कोई उनका हौसला बढ़ाता है तो कोई उनके संकल्प को प्रणाम करता है।
इतनी कठिन यात्रा को संभव बनाने के लिए उनके साथ एक अन्य शिवभक्त भी लगातार चल रहे हैं, जो हर पल उनकी सहायता करते हैं। साथ ही एक वाहन भी चल रहा है, जिसमें आवश्यक दवाइयां, भोजन और अन्य जरूरत का सामान रखा गया है, ताकि किसी आपात स्थिति में तुरंत मदद मिल सके।
सुबोध मानते हैं कि यह केवल शारीरिक क्षमता की परीक्षा नहीं, बल्कि धैर्य, विश्वास और समर्पण की साधना है। उनका कहना है कि ऐसी यात्रा के लिए महीनों पहले से तैयारी की जा सकती है, लेकिन सफलता केवल अभ्यास से नहीं मिलती। “पूर्वाभ्यास शरीर को तैयार कर सकता है, लेकिन बाबा के दरबार तक पहुंचाना उनकी कृपा ही करती है,” वे कहते हैं।
श्रावणी मेले में जहां लाखों कांवरिए आस्था की डगर पर आगे बढ़ रहे हैं, वहीं सुबोध कुमार सिंह की घुटनों के बल यात्रा यह संदेश दे रही है कि भक्ति का मार्ग सबके लिए अलग हो सकता है, लेकिन मंजिल एक ही है—बाबा बैद्यनाथ के चरण। यही कारण है कि कांवर पथ पर उन्हें देखने वाले श्रद्धालु एक ही बात कहते हैं—आस्था जब संकल्प बन जाती है, तब कठिन से कठिन राह भी छोटी पड़ जाती है।
















