


प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। जिस जगह की पहचान अक्सर सलाखों, पहरे और बंद दरवाजों से होती है, वहीं रंगों ने एक अलग कहानी लिखी। महिला मंडल कारा, भागलपुर में जब मंजूषा की रेखाएं उभरीं तो जेल की दीवारों के बीच उम्मीद, रचनात्मकता और आत्मविश्वास के रंग दिखाई देने लगे।
भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR), विदेश मंत्रालय, भारत सरकार की ओर से महिला बंदियों के लिए ‘मंजूषा के रंगों से उम्मीदों की नई कहानी’ विषय पर दो दिवसीय कला कार्यशाला शुरू की गई। 8 और 9 अगस्त को आयोजित इस कार्यशाला में मंजूषा कला गुरु मनोज पंडित महिला बंदियों को अंग प्रदेश की इस विशिष्ट लोककला की बारीकियां सिखा रहे हैं।

कार्यशाला का उद्घाटन ICCR के प्रतिनिधि, मंजूषा कला गुरु मनोज पंडित, शहीद जुब्बा सहनी केंद्रीय कारा के जेल अधीक्षक, कला सांस्कृतिक पदाधिकारी अंकित रंजन तथा महिला मंडल कारा की जेल अधीक्षक ने संयुक्त रूप से किया।
बिहुला-विषहरी की कथा से रंगों तक का सफर
कार्यशाला में महिलाओं को सिर्फ चित्र बनाना नहीं सिखाया जा रहा, बल्कि मंजूषा के पीछे छिपी अंग प्रदेश की लोकस्मृति और संस्कृति से भी परिचित कराया जा रहा है। मंजूषा कला की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के साथ बिहुला-विषहरी की लोकगाथा, इसके प्रमुख प्रतीकों, आकृतियों और पारंपरिक रंगों के महत्व को समझाया गया।
महिला बंदियों ने भी पूरे उत्साह के साथ रंग और रेखाओं को अपनाया। किसी ने पारंपरिक आकृतियों को उकेरा तो किसी ने रंगों के माध्यम से अपनी कल्पना को आकार दिया। इस दौरान कला उनके लिए महज सीखने की गतिविधि नहीं रही, बल्कि खुद को अभिव्यक्त करने का एक नया माध्यम बनती दिखाई दी।
महिला मंडल कारा की जेल अधीक्षक ने कहा कि कारा सुधार का अर्थ केवल सुरक्षा और अनुशासन बनाए रखना नहीं है। बंदियों के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचानना और उसे रचनात्मक दिशा देना भी सुधार प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
ICCR के प्रतिनिधि ने कहा कि भारतीय लोककलाएं देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत हैं।मंजूषा कला गुरु मनोज पंडित ने कहा कि मंजूषा सिर्फ चित्र बनाने की कला नहीं है। यह अंग प्रदेश की लोकसंस्कृति, आस्था, लोकगाथा और नारी शक्ति को अभिव्यक्त करने वाली विशिष्ट परंपरा है।
सलाखों के बीच संस्कृति से जुड़ने का अवसर
दो दिवसीय कार्यशाला महिला बंदियों के लिए अपनी रचनात्मक क्षमता को पहचानने और निखारने का अवसर लेकर आई है। खास बात यह है कि इस पहल के जरिए वे अपने आसपास की क्षेत्रीय सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ रही हैं।
सलाखों के पीछे खिले मंजूषा के रंग, महिला बंदियों ने कैनवास पर लिखी ‘उम्मीद’
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। जिस जगह की पहचान अक्सर सलाखों, पहरे और बंद दरवाजों से होती है, वहीं रंगों ने एक अलग कहानी लिखी। महिला मंडल कारा, भागलपुर में जब मंजूषा की रेखाएं उभरीं तो जेल की दीवारों के बीच उम्मीद, रचनात्मकता और आत्मविश्वास के रंग दिखाई देने लगे।
भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR), विदेश मंत्रालय, भारत सरकार की ओर से महिला बंदियों के लिए ‘मंजूषा के रंगों से उम्मीदों की नई कहानी’ विषय पर दो दिवसीय कला कार्यशाला शुरू की गई। 8 और 9 अगस्त को आयोजित इस कार्यशाला में मंजूषा कला गुरु मनोज पंडित महिला बंदियों को अंग प्रदेश की इस विशिष्ट लोककला की बारीकियां सिखा रहे हैं।
कार्यशाला का उद्घाटन ICCR के प्रतिनिधि, मंजूषा कला गुरु मनोज पंडित, शहीद जुब्बा सहनी केंद्रीय कारा के जेल अधीक्षक, कला सांस्कृतिक पदाधिकारी अंकित रंजन तथा महिला मंडल कारा की जेल अधीक्षक ने संयुक्त रूप से किया।
बिहुला-विषहरी की कथा से रंगों तक का सफर
कार्यशाला में महिलाओं को सिर्फ चित्र बनाना नहीं सिखाया जा रहा, बल्कि मंजूषा के पीछे छिपी अंग प्रदेश की लोकस्मृति और संस्कृति से भी परिचित कराया जा रहा है। मंजूषा कला की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के साथ बिहुला-विषहरी की लोकगाथा, इसके प्रमुख प्रतीकों, आकृतियों और पारंपरिक रंगों के महत्व को समझाया गया।
महिला बंदियों ने भी पूरे उत्साह के साथ रंग और रेखाओं को अपनाया। किसी ने पारंपरिक आकृतियों को उकेरा तो किसी ने रंगों के माध्यम से अपनी कल्पना को आकार दिया। इस दौरान कला उनके लिए महज सीखने की गतिविधि नहीं रही, बल्कि खुद को अभिव्यक्त करने का एक नया माध्यम बनती दिखाई दी।
महिला मंडल कारा की जेल अधीक्षक ने कहा कि कारा सुधार का अर्थ केवल सुरक्षा और अनुशासन बनाए रखना नहीं है। बंदियों के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचानना और उसे रचनात्मक दिशा देना भी सुधार प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
ICCR के प्रतिनिधि ने कहा कि भारतीय लोककलाएं देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत हैं।मंजूषा कला गुरु मनोज पंडित ने कहा कि मंजूषा सिर्फ चित्र बनाने की कला नहीं है। यह अंग प्रदेश की लोकसंस्कृति, आस्था, लोकगाथा और नारी शक्ति को अभिव्यक्त करने वाली विशिष्ट परंपरा है।
सलाखों के बीच संस्कृति से जुड़ने का अवसर
दो दिवसीय कार्यशाला महिला बंदियों के लिए अपनी रचनात्मक क्षमता को पहचानने और निखारने का अवसर लेकर आई है। खास बात यह है कि इस पहल के जरिए वे अपने आसपास की क्षेत्रीय सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ रही हैं।
















