


@ सुल्तानगंज से बाबा बैद्यनाथ धाम तक 90 वर्ष की उम्र में भी जारी है पैदल कांवर यात्रा, मरणासन्न छोटे भाई के स्वस्थ होने की मन्नत पूरी होने पर 1974 में शुरू किया था सफर।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। सावन की पवित्र फुहारों के बीच जब हजारों-लाखों कांवरिये बाबा बैद्यनाथ के दरबार की ओर कदम बढ़ाते हैं, तो उनमें कुछ चेहरे ऐसे भी होते हैं, जिनकी आस्था उम्र की सीमाओं को भी मात देती दिखाई देती है। ऐसा ही एक प्रेरणादायी चेहरा है 90 वर्षीय बाबा का, जो वर्ष 1974 से लगातार कंधे पर कांवर लेकर सुल्तानगंज से बाबा बैद्यनाथ धाम तक पैदल यात्रा कर रहे हैं। रिकार्ड 51 वर्षों से अनवरत जारी इस कांवर यात्रा के पीछे सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि एक ऐसी मार्मिक कहानी है, जिसमें संकट, प्रार्थना, विश्वास और भगवान के प्रति अटूट आस्था समाई हुई है। इस कांवर में गंगाजल के साथ छह पसेरी यानी 30 किग्रा का वजन भी साथ है। जिसमें बाबा के जरूरी सामान हैं।

बाबा बताते हैं कि वर्षों पहले उनके भाई सहित चार लोग गांव के एक कुएं में गिर गए थे। हादसा इतना गंभीर था कि परिवार पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उनके भाई को करीब 20 दिनों तक इलाजरत रहना पड़ा। हालत ऐसी थी कि उनकी आवाज तक चली गई थी। पैर काटने की नौबत आ गई थी।परिवार के सामने चिंता थी कि आखिर उनका भाई स्वस्थ होकर फिर से सामान्य जीवन जी पाएगा या नहीं।
उस कठिन दौर में बाबा ने बाबा बैद्यनाथ के दरबार में अपनी पीड़ा रखी। उन्होंने मन ही मन प्रार्थना की कि यदि उनका भाई स्वस्थ होकर दोबारा अपने पैरों पर चलने-फिरने लगे, तो वह जीवनभर सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर बाबा बैद्यनाथ धाम पैदल आएंगे और अपने आराध्य का जलाभिषेक करेंगे।
बाबा कहते हैं, ‘बाबा ने मेरी सुन ली।’
समय बीता और भाई की हालत में सुधार होने लगा। धीरे-धीरे वह स्वस्थ हुए और फिर चलने-फिरने लगे। बाबा के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। उन्होंने अपनी कही बात को संकल्प बना लिया। वर्ष 1974 में उन्होंने पहली बार सुल्तानगंज से कांवर उठाई और गंगाजल लेकर पैदल बाबा बैद्यनाथ धाम की ओर निकल पड़े।
उस दिन से शुरू हुआ आस्था का यह सफर आज पांच दशक से अधिक समय बाद भी जारी है। बांका निवासी 90 वर्षीय बाबा कहते हैं। शरीर पहले जैसा साथ नहीं देता, कदमों की रफ्तार भी धीमी हुई है, लेकिन बाबा की आस्था आज भी उतनी ही मजबूत है। कंधे पर कांवर और मन में बाबा बैद्यनाथ का नाम लेकर वह हर वर्ष इस कठिन पैदल यात्रा पर निकल पड़ते हैं। फिर भी जब तक जान है बाबा नगरी जाएंगे।

सुल्तानगंज से देवघर तक की यह यात्रा किसी सामान्य राहगीर के लिए भी आसान नहीं होती। तपती सड़क, बारिश, लंबा रास्ता, थकान और शरीर की तकलीफ – इन सबके बीच बाबा का निरंतर चलते रहना अपने आप में श्रद्धा की मिसाल है।
बाबा के लिए यह सिर्फ कांवर यात्रा नहीं, बल्कि उस वचन को निभाने की यात्रा है, जो उन्होंने अपने भाई के जीवन के लिए भगवान से किया था। भाई के स्वस्थ होने की खुशी ने जिस संकल्प को जन्म दिया, वही संकल्प अब उनकी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।
51 वर्षों से बाबा का हर कदम मानो यही संदेश देता है कि सच्ची आस्था उम्र नहीं देखती। शरीर थक सकता है, रास्ता लंबा हो सकता है, लेकिन मन में विश्वास हो तो इंसान अपनी मंजिल की ओर बढ़ता रहता है। आज जब 90 वर्ष की उम्र में भी बाबा कंधे पर कांवर उठाकर बाबा बैद्यनाथ के दरबार की ओर बढ़ते हैं, तो उनके कदमों में सिर्फ पांच दशक पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि एक भाई के स्वस्थ होने की खुशी, भगवान के प्रति कृतज्ञता और अपने संकल्प को जीवनभर निभाने का जज्बा दिखाई देता है।बाबा की यह यात्रा बताती है कि आस्था अगर दिल से हो, तो उम्र की थकान भी उसके सामने छोटी पड़ जाती है।
















