


@ त्रिलिंग क्षेत्र की मान्यता से लेकर समुद्र मंथन की पौराणिक गाथा तक, मंदार पर्वत समेटे है सनातन आस्था की अनूठी विरासत।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। बिहार के बांका जिले में स्थित मंदार पर्वत सिर्फ समुद्र मंथन की पौराणिक कथा और ऐतिहासिक विरासत का साक्षी नहीं है, बल्कि यह शिव और विष्णु उपासना के अद्भुत संगम का भी प्रमुख केंद्र है। पर्वत शिखर पर विराजमान काशी विश्वनाथ शिवलिंग मंदार की धार्मिक महत्ता को और विशिष्ट बनाता है। धार्मिक मान्यता है कि काशी विश्वनाथ के यहां विराजमान होने के कारण मंदार सहित आसपास का भूभाग त्रिलिंग क्षेत्र कहलाता है।
तीन शिवलिंगों से जुड़ी है त्रिलिंग क्षेत्र की मान्यता

सनातन परंपरा के अनुसार मंदार क्षेत्र के दक्षिण में स्थित रावणेश्वर वैद्यनाथ, बासुकीनाथ धाम के नागेश्वर और मंदार पर्वत शिखर पर विराजमान काशी विश्वनाथ—इन तीन प्रमुख शिवलिंगों से घिरे क्षेत्र को त्रिलिंग क्षेत्र कहा जाता है। मान्यता है कि इन तीनों ज्योतिर्मय आस्था केंद्रों की मौजूदगी ने इस भूभाग को शिव आराधना की दृष्टि से अत्यंत पवित्र बना दिया है।
मधुसूदन के प्रेम में स्वयं शिव ने स्थापित किया शिवलिंग
पौराणिक कथाओं में मंदार का भगवान शिव से गहरा संबंध बताया गया है। मान्यता है कि भगवान शिव ने भक्त दिवोदास को काशी प्रदान करने के बाद सती के साथ बादलों पर निवास किया, जिसके कारण उन्हें जीमूतवाहन भी कहा गया। बाद में मंदार के अधिपति देवराज इंद्र ने भगवान शिव को मंदराचल पर्वत पर निवास करने का निमंत्रण दिया। कहा जाता है कि भगवान शिव ने लंबे समय तक मंदार को अपनी वासस्थली बनाया।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, मंदार से काशी लौटते समय भगवान शिव ने भगवान मधुसूदन के प्रति अपने प्रेम और स्नेह के प्रतीक के रूप में पर्वत शिखर पर स्वयं शिवलिंग की स्थापना की। कालांतर में यही शिवलिंग काशी विश्वनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ऊंचे पर्वत शिखर पर स्थित इस मंदिर तक पहुंचकर श्रद्धालु भगवान शिव का दर्शन करते हैं और स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं।
मंदार की चट्टानों में गूंजती है शिव आराधना
मंदार पर्वत की धार्मिक महत्ता केवल काशी विश्वनाथ तक सीमित नहीं है। पर्वत के विभिन्न हिस्सों में करीब एक दर्जन शिवलिंग श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। इनके साथ कई पवित्र कुंड और धार्मिक स्थल भी जुड़े हुए हैं। पर्वत की तराई में स्थित अर्धनारीश्वर शिवलिंग भी विशेष श्रद्धा का केंद्र माना जाता है।

धार्मिक मान्यता है कि मंदार पर्वत पर 33 कोटि देवी-देवताओं का वास है। यही विश्वास इस पर्वत को श्रद्धालुओं के लिए साधना, दर्शन और पुण्य अर्जन का महत्वपूर्ण स्थल बनाता है।
समुद्र मंथन से जुड़ा है मंदार का अमर प्रसंग
मंदार पर्वत का सबसे प्रसिद्ध पौराणिक संबंध समुद्र मंथन से है। मान्यता है कि देवताओं और असुरों ने मंदराचल पर्वत को मथनी बनाकर समुद्र मंथन किया था। इसी मंथन से निकले विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण किया और नीलकंठ कहलाए। समुद्र मंथन की यह कथा मंदार को शिव उपासना की परंपरा में एक अलग और विशेष स्थान प्रदान करती है।
सावन में हर-हर महादेव से गूंज उठता है मंदार
सावन के महीने में मंदार पर्वत का धार्मिक वातावरण और भी जीवंत हो उठता है। दूर-दराज से शिवभक्त यहां पहुंचकर काशी विश्वनाथ समेत पर्वत पर स्थित अन्य शिवलिंगों का दर्शन और पूजन करते हैं। श्रद्धालुओं की आस्था, मंदिरों में होने वाली पूजा और हर-हर महादेव के जयघोष से पूरा मंदार भक्तिमय हो उठता है।
धार्मिक मान्यताओं, त्रिलिंग क्षेत्र की अवधारणा, अनेक शिवलिंगों की मौजूदगी और समुद्र मंथन से जुड़े पौराणिक प्रसंगों के कारण मंदार सिर्फ एक पर्वत नहीं, बल्कि बिहार की प्राचीन आध्यात्मिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। यहां शिव और विष्णु उपासना का समन्वय सनातन परंपरा की उस विरासत को सामने लाता है, जिसमें अलग-अलग धार्मिक धाराएं एक ही आस्था में समाहित होती दिखाई देती हैं।
















