


प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। गंगा का पानी बढ़ा तो दियारा की जिंदगी भी जैसे ठहर गई। तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के पीछे का इलाका अब पानी के घेरे में है। शंकरपुर, चौवनिया, दारापुर, रत्तीपुर, बैरिया और अजमेरीपुर समेत कई इलाकों में बाढ़ का पानी घरों तक पहुंच गया है। करीब 50 हजार की आबादी इस बाढ़ की मार झेल रही है।
हालात ऐसे हैं कि जिन गलियों में कभी बच्चे दौड़ते थे, वहां अब नाव चल रही है। घरों में पानी घुसने के बाद लोग जरूरी सामान, बच्चों और मवेशियों को लेकर ऊंचे और सुरक्षित ठिकानों की ओर निकल रहे हैं। सड़कें और संपर्क मार्ग डूबने से रोजमर्रा की जिंदगी पूरी तरह प्रभावित हो गई है।

बाढ़ का पानी ही नहीं, रास्ते भी बने मुसीबत:
स्थानीय लोगों के मुताबिक टीएमबीयू परिसर की ओर आने-जाने वाले कई रास्ते और गेट बंद हैं। इसका सीधा असर बाढ़ प्रभावित लोगों पर पड़ रहा है। लोगों को करीब पांच किलोमीटर अतिरिक्त घूमकर जाना पड़ रहा है। मुश्किल सिर्फ दूरी की नहीं है। बाढ़ के बीच किसी मरीज को अस्पताल पहुंचाना हो या किसी बुजुर्ग को सुरक्षित स्थान तक ले जाना हो, हर कदम चुनौती बन गया है।
जहां हर साल मिलती थी पनाह, वहीं इस बार रोक:
बाढ़ के बीच सबसे ज्यादा नाराजगी टीएनबी कॉलेजिएट मैदान को लेकर सामने आई। ग्रामीणों का कहना है कि यह मैदान वर्षों से बाढ़ के दौरान आसपास के लोगों के लिए ऊंचा और सुरक्षित ठिकाना रहा है। ग्रामीणों के अनुसार सोमवार रात कुछ परिवार यहां पहुंचे थे। मंगलवार और बुधवार सुबह बड़ी संख्या में लोग मवेशियों और घरेलू सामान के साथ मैदान की ओर आए, लेकिन उन्हें प्रवेश नहीं दिया गया। इसके बाद मौके पर विरोध की स्थिति बन गई। बताया गया कि नगर निगम की ओर से मैदान में पार्क निर्माण का काम चल रहा है। इसी वजह से प्रवेश रोकने का प्रयास किया गया। बाढ़ पीड़ितों और संवेदक के बीच कहासुनी की भी बात सामने आई है।
सवाल एक मैदान का नहीं, आश्रय का है:
ग्रामीणों का कहना है कि जब घर पानी में डूब रहे हों और सिर छिपाने के लिए कोई सुरक्षित जगह न हो, तब लोगों को ऊंचे स्थान पर शरण लेने से नहीं रोका जाना चाहिए। ग्रामीणों ने प्रशासन से तत्काल राहत शिविर शुरू करने, सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराने और बाढ़ प्रभावित इलाकों में नावों की संख्या बढ़ाने की मांग की है।

शंकरपुर पंचायत के मुखिया ने भी नाथनगर के अंचलाधिकारी को इलाके की स्थिति से अवगत कराया है। ग्रामीणों का कहना है कि हर साल बाढ़ के दौरान शिविर की व्यवस्था की जाती रही है, इसलिए इस बार भी तत्काल अस्थायी आश्रय की जरूरत है।
दियारा में अब सबसे बड़ा सवाल – कहां जाएं लोग:
गंगा का बढ़ता पानी दियारा के घरों की चौखट पार कर चुका है। सड़कें डूब चुकी हैं, रास्ते बंद हैं और सुरक्षित ठिकानों को लेकर भी असमंजस है। ऐसे में करीब 30 हजार लोगों के सामने फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है – पानी से बचकर जाएं तो जाएं कहां? प्रशासन के सामने अब चुनौती सिर्फ बाढ़ का पानी नियंत्रित करने की नहीं, बल्कि प्रभावित परिवारों को सुरक्षित आश्रय, नाव और आवागमन की सुविधा तत्काल उपलब्ध कराने की भी है।
















