


@ बिहार कृषि विश्वविद्यालय में आयोजित हुई प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण कार्यशाला।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। किसानों को प्राकृतिक एवं जैविक खेती के महत्व, इसके लाभ तथा मृदा और पर्यावरण संरक्षण में इसकी भूमिका की जानकारी देने के उद्देश्य से बुधवार को बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के सभागार में प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला का आयोजन जिला कृषि कार्यालय, भागलपुर के तत्वावधान में किया गया।
कार्यक्रम का उद्घाटन बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह, प्राचार्य-सह-अधिष्ठाता डॉ. रूबी रानी, जिला कृषि पदाधिकारी प्रेम शंकर प्रसाद एवं उप परियोजना निदेशक, आत्मा प्रभात कुमार सिंह ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया।

कार्यशाला को संबोधित करते हुए कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में प्राकृतिक एवं जैविक खेती की आवश्यकता और संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं। मृदा में कार्बन एवं जैविक पदार्थ की कमी पर चिंता जताते हुए उन्होंने मृदा स्वास्थ्य और उर्वरता बनाए रखने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने प्राकृतिक और जैविक खेती के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए किसानों से प्राकृतिक संसाधनों के समुचित उपयोग की अपील की। उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र में नई तकनीक और तकनीकी ज्ञान को अपनाना समय की आवश्यकता है। प्राकृतिक खेती के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के साथ टिकाऊ और लाभकारी कृषि को बढ़ावा दिया जा सकता है।
प्रशिक्षण सत्र में विशेषज्ञों ने किसानों को प्राकृतिक खेती की विभिन्न तकनीकों की जानकारी दी। डॉ. शम्भू प्रसाद, शस्य विज्ञान वैज्ञानिक, बिहार कृषि विश्वविद्यालय ने जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत, पंचगव्य और वर्मी कम्पोस्ट सहित विभिन्न जैविक इनपुट के निर्माण एवं उपयोग के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर खेती की लागत कम करने के साथ मिट्टी में जैविक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सकता है।
मृदा विज्ञान वैज्ञानिक डॉ. अरुण कुमार झा ने कहा कि बेहतर उत्पादन के लिए मृदा में आवश्यक पोषक तत्वों की संतुलित उपलब्धता जरूरी है। उन्होंने मृदा में कार्बन की मात्रा बढ़ाने को महत्वपूर्ण बताते हुए कार्बन और नाइट्रोजन के संतुलन पर भी जानकारी दी। जिला कृषि पदाधिकारी ने किसानों को उर्वरकों के संतुलित एवं आवश्यकता के अनुरूप उपयोग की सलाह दी। उन्होंने अनावश्यक और हानिकारक उर्वरक के प्रयोग से बचने तथा मृदा स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर कृषि कार्य करने पर जोर दिया।
कार्यशाला में किसानों को शीघ्र तैयार होने वाली फसल किस्मों को अपनाने के लाभ भी बताए गए।
कार्यक्रम में जिलास्तरीय, अनुमंडल, प्रखंड एवं पंचायत स्तर के पदाधिकारी और कर्मी उपस्थित रहे। मंच का संचालन उप परियोजना निदेशक, आत्मा प्रभात कुमार सिंह ने किया। अंत में अनुमंडल कृषि पदाधिकारी, नवगछिया वरुण कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

















