


@ देश में करीब 5.5 करोड़ और बिहार में लगभग 64 लाख मामले लंबित बताए जा रहे हैं।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। अदालतों में लंबित मामलों का आंकड़ा करोड़ों में पहुंच चुका है। देश में करीब 5.5 करोड़ और बिहार में लगभग 64 लाख मामले लंबित बताए जा रहे हैं। ऐसे में शनिवार को भागलपुर में अदालत का एक अलग चेहरा नजर आया जहां बहस से ज्यादा जोर बातचीत और समझौते पर था।
राष्ट्रीय लोक अदालत के लिए जिले में 27 बेंच बनाई गईं। अलग-अलग तरह के मामलों को अलग बेंच पर रखा गया। पक्षकार पहुंचे और वर्षों से चले आ रहे विवादों को आगे खींचने के बजाय आपसी सहमति से खत्म करने की कोशिश हुई।

‘जीत-हार’ नहीं, दोनों पक्षों की रजामंदी:
राष्ट्रीय लोक अदालत की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहां फैसला किसी एक पक्ष की जीत या दूसरे की हार के रूप में नहीं, बल्कि आपसी सहमति से विवाद खत्म करने के रूप में सामने आता है।
दोनों पक्ष एक साथ बैठते हैं, अपनी बात रखते हैं और समाधान का रास्ता तलाशते हैं। समझौते से मामला समाप्त होने के बाद सामान्य तौर पर उस पर आगे अपील का रास्ता नहीं रहता। यानी जिस विवाद के लिए लंबे समय तक अदालत के चक्कर लगाने पड़ सकते थे, उसे सहमति की एक प्रक्रिया में विराम मिल जाता है।
करोड़ों लंबित मामलों के बीच लोक अदालत पर उम्मीद:
भागलपुर के जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने लंबित मामलों की स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि देशभर में करीब साढ़े पांच करोड़ मामले लंबित हैं। बिहार में भी लगभग 64 लाख मामले लंबित बताए गए हैं। उन्होंने उपलब्ध एआई-जनरेटेड आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि इनमें करीब 40 लाख मामले आपराधिक प्रकृति के हैं, जबकि लगभग 10 लाख कंपाउंडेबल क्रिमिनल केस की श्रेणी में आते हैं।उनका जोर इस बात पर रहा कि जितने अधिक मामले सुलह के रास्ते लोक अदालत तक आएंगे, उतनी ही तेजी से लंबित मामलों का बोझ कम किया जा सकेगा।
कोर्ट से बाहर नहीं, समाधान कोर्ट के भीतर:
लोक अदालत में चालान समेत अलग-अलग प्रकृति के मामलों के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी। न्यायिक अधिकारियों के साथ प्रशासन और पुलिस के अधिकारी भी मौजूद रहे। जिला एवं सत्र न्यायाधीश, जिलाधिकारी अलंकृता पांडे, एसएसपी प्रमोद कुमार यादव, फैमिली कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश और डालसा के सचिव समेत कई अधिकारी व्यवस्था का हिस्सा रहे।
जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने उपभोक्ता अदालत और शिक्षा ट्रिब्यूनल जैसे संस्थानों से भी अधिक मामलों को लोक अदालत में लाने पर जोर दिया। उनका कहना था कि ऐसे मामलों के त्वरित निपटारे के लिए लोक अदालत प्रभावी मंच बन सकती है।
फीस नहीं, उलटे कोर्ट फीस वापसी का प्रावधान
लोक अदालत में मामलों के निपटारे के लिए किसी तरह की फीस नहीं ली जाती। यदि कोई मामला सुलह-समझौते के आधार पर समाप्त होता है तो नियमानुसार जमा कोर्ट फीस वापस भी की जाती है।

















