


@ कटाव थमा, मगर गांवों से पानी निकलने की रफ्तार बेहद धीमी; गंगा पार के दियारा इलाकों में अब भी शिविरों में विस्थापित जीवन जी रहे ग्रामीण।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। जिस तेजी और भयावहता के साथ गंगा ने भागलपुर के दियारा और तटवर्ती इलाकों में अपना रौद्र रूप दिखाया था, उसे याद कर आज भी ग्रामीणों की रूह कांप उठती है। कुछ ही दिनों के भीतर उफनती गंगा ने कहीं तटबंधों को अपनी चपेट में लिया तो कहीं सड़क, खेत-खलिहान और घर-द्वार तक पानी पहुंच गया। देखते ही देखते कई परिवारों का आशियाना जलमग्न हो गया।
हालांकि पिछले कई दिनों से गंगा का जलस्तर और प्रवाह अपेक्षाकृत शांत है। नदी का रौद्र रूप थमा है और फिलहाल कटाव भी लगभग शून्य बताया जा रहा है। लेकिन बाढ़ प्रभावित ग्रामीणों की परेशानी अभी खत्म नहीं हुई है। गंगा शांत जरूर हुई है, मगर अपने कब्जे वाले गांवों और घरों को खाली करने के लिए तैयार नहीं दिख रही।
कटाव रुका, लेकिन जलजमाव ने बढ़ाई मुश्किल:
बाढ़ के शुरुआती दौर में जहां ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता तटबंध और कटाव को लेकर थी, वहीं अब जलजमाव सबसे बड़ी समस्या बन गया है। गंगा पार दियारा इलाके के कई गांवों में अभी भी बाढ़ का पानी लोगों के लिए बड़ी मुसीबत बना हुआ है। कहीं घरों में कमर तक पानी जमा है तो कहीं जलस्तर गर्दन तक पहुंचा हुआ है। ऐसे में ग्रामीण अपने घरों में वापस लौटने की स्थिति में नहीं हैं। शिविरों में रह रहे लोगों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि आखिर कब वह दिन आएगा, जब वे अपने घर की चौखट पर फिर से कदम रख सकेंगे।
घर लौटने की आस में टकटकी लगाए परिवार:
राहत शिविरों में रह रहे विस्थापित परिवारों की आंखें अब भी अपने गांव और घर की ओर लगी हुई हैं। बाढ़ का पानी भले ही धीरे-धीरे कम हो रहा हो, लेकिन घर लौटने का रास्ता अभी साफ नहीं हुआ है।

कई परिवारों के सामने दोहरी चिंता है। एक तरफ पानी कम होने का इंतजार है, तो दूसरी तरफ इस बात का डर कि जब वे घर लौटेंगे तो वहां क्या बचा होगा। लंबे समय तक पानी में डूबे रहने के कारण घरों की दीवारें कमजोर होने, अनाज और घरेलू सामान खराब होने तथा जरूरी दस्तावेजों के नष्ट होने की आशंका बनी हुई है।
रोज होती है घर की सलामती की दुआ:
राहत शिविरों में रहने वाले परिवारों की जिंदगी इस समय इंतजार के इर्द-गिर्द सिमट गई है। सुबह आंख खुलते ही पानी की स्थिति की जानकारी लेना और शाम को नदी के हालात पर चर्चा करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। किसी को अपने घर की चिंता है तो किसी को मवेशियों की। किसी को खेत में लगी फसल की चिंता सता रही है तो किसी को बच्चों की पढ़ाई की। पशुपालकों के सामने चारे और पशुओं को सुरक्षित रखने की चुनौती बनी हुई है। ऐसे में ग्रामीण हर दिन यही दुआ कर रहे हैं कि गंगा अब पूरी तरह शांत रहे, पानी तेजी से नीचे जाए और उनके घर सुरक्षित बचें।
बाढ़ के बाद की चुनौती और बड़ी:
दरअसल, बाढ़ के दौरान राहत और बचाव कार्य जितना महत्वपूर्ण होता है, उतना ही महत्वपूर्ण बाढ़ के बाद लोगों को सामान्य जिंदगी में वापस लाना भी है। बिहपुर के प्रभावित इलाकों में अब यही सबसे बड़ी चुनौती है। ग्रामीणों को सुरक्षित तरीके से घर वापस पहुंचाना, जलनिकासी कराना, क्षतिग्रस्त सड़कों और रास्तों को दुरुस्त करना, बिजली और पेयजल की व्यवस्था बहाल करना तथा खेतों में जमा पानी निकालना प्रशासन के सामने बड़ी जिम्मेदारी है।
फिलहाल ग्रामीणों की नजर आसमान और गंगा दोनों पर है। उनकी एक ही उम्मीद है – गंगा अब और न बढ़े, पानी तेजी से उतरे और उन्हें जल्द अपने घर लौटने का मौका मिले। गंगा की लहरें शांत हैं, कटाव थम चुका है, लेकिन हजारों ग्रामीणों की जिंदगी अभी भी उस पानी में अटकी हुई है, जो उनके घरों से निकलने का नाम नहीं ले रहा।

















