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नवगछिया । बिहपुर स्थित माँ वाम काली मंदिर में इस वर्ष भी पूजा की तैयारियाँ जोरों पर हैं। यह शक्ति स्थल न केवल बिहपुर के लोगों के लिए आस्था का केंद्र है, बल्कि आसपास के जिलों और दूर-दराज़ क्षेत्रों से भी श्रद्धालु यहाँ पहुंचते हैं। तांत्रिक विधि से होने वाली माँ वाम काली की यह पूजा अपनी विशिष्ट परंपरा और रहस्यमय कथा के कारण प्रसिद्ध है। स्थानीय मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद अवश्य पूरी होती है। मां की कृपा प्राप्त करने के लिए लोग यहाँ वर्षों से आते रहे हैं। किसी की मनोकामना पूरी होने पर वह यहाँ बलि चढ़ाने या मुंडन करवाने आता है।

इस स्थल से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा बादुर तांती नामक गरीब परिवार से है। बादुर तांती उस समय एक कायस्थ परिवार के यहाँ बकरी चराने का काम करता था। उसकी उम्र बहुत कम थी, लेकिन उसमें भक्ति और बालसुलभ खेल दोनों समाए हुए थे। एक दिन अपने मित्रों के साथ उसने मिट्टी से माँ काली की छोटी प्रतिमा बनाई। खेल-खेल में उसने एक छागड़ पकड़ा और मां काली से बलि स्वीकार करने की प्रार्थना करते हुए कुश से हल्का प्रहार किया। इसी बीच बकरी दो भागों में विभाजित होकर गिर पड़ी। यह दृश्य देखकर सभी बच्चे भयभीत होकर भाग गए। रातभर बादुर भय और अपराधबोध से सो न सका। सुबह उसने पूरी घटना अपने पिता को बताई। पहले पिता ने विश्वास नहीं किया, लेकिन बादुर ने वही प्रक्रिया दोहराई, तो चमत्कार फिर से हुआ।

इसके बाद बादुर के पिता ने पूरी घटना अपने मालिक को बताई। मालिक की उपस्थिति में जब घटना दोहराई गई, तो वही चमत्कार हुआ। भय और श्रद्धा के बीच रात गुज़री। उसी रात कायस्थ परिवार के मुखिया को माँ काली ने स्वप्न में दर्शन दिए और कहा कि उन्हें डरने की जरूरत नहीं है और मेरी स्थापना करें। अगले दिन एक पेड़ के नीचे माँ वाम काली की पिंडी स्थापित की गई। इसी क्षण से यह स्थल शक्ति उपासना का केंद्र बन गया। कालांतर में यह मंदिर बिहपुर के प्रमुख शक्ति पीठों में से एक के रूप में प्रसिद्ध हुआ। आज भी वही वृक्ष मौजूद है, जिसके नीचे माँ वाम काली की स्थापना की गई थी।

कहा जाता है कि यहाँ की पूजा तांत्रिक विधि से होती है और साज-श्रृंगार चढ़ाने की यह परंपरा सौ वर्षों से भी अधिक समय से चली आ रही है। हर वर्ष दीपावली के समय यहाँ भक्तों की भीड़ उमड़ती है। बिहपुर का यह शक्ति स्थल न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसकी पौराणिक कथा लोगों के मन में भक्ति और विश्वास का दीप जलाए रखती है। आज भी माँ वाम काली मंदिर में जब पूजा की घंटियाँ बजती हैं, तो स्थानीय जनमानस उस बालक बादुर तांती को याद करता है, जिसने अनजाने में इस चमत्कारिक स्थान की नींव रखी थी। बिहपुर की धरती पर माँ वाम काली की आराधना न केवल परंपरा का प्रतीक है, बल्कि यह विश्वास की उस शक्ति का भी प्रमाण है, जो समय के हर दौर में लोगों को जोड़ती रही है।

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