


@ राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत 375 एकड़ में विकसित होंगे तीन क्लस्टर। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के लिए 2,481 करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं। इसके तहत देशभर में 7.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देते हुए 15 हजार ग्राम क्लस्टरों के माध्यम से एक करोड़ किसानों को लाभ पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
प्रदीप विद्रोही

भागलपुर। खेती को रसायनों की गिरफ्त से बाहर निकालकर पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में भागलपुर ने बड़ा कदम बढ़ाया है। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF) के तहत जिले में 375 एकड़ क्षेत्र में प्राकृतिक और जैविक धान की खेती के लिए तीन कृषि क्लस्टरों का चयन किया गया है। इस योजना का उद्देश्य किसानों की लागत घटाना, मिट्टी की सेहत सुधारना और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए उनकी आय बढ़ाना है।
योजना के तहत सुल्तानगंज प्रखंड की खानपुर पंचायत, जगदीशपुर की भवानीपुर देशरी पंचायत तथा गोराडीह प्रखंड की तरचा, दमचक, सोंडीहा और सतजोरी पंचायतों को शामिल किया गया है। प्रत्येक प्रखंड में 125 एकड़ भूमि पर प्राकृतिक खेती का मॉडल विकसित किया जाएगा।
इस अभियान की खास बात यह है कि खेती में रासायनिक खाद, कीटनाशक और खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल पूरी तरह बंद रहेगा। किसान गोबर और गोमूत्र से तैयार जैविक खाद, बीजामृत और जीवामृत जैसे पारंपरिक तरीकों का उपयोग करेंगे। इसके साथ ही फसल चक्र, बहुफसली खेती, मल्चिंग और देसी गाय के पालन को भी खेती से जोड़ा जाएगा, जिससे मिट्टी की उर्वरता और उत्पादन क्षमता दोनों बढ़ेंगी।
जिला कृषि पदाधिकारी प्रेम शंकर प्रसाद ने बताया कि चयनित पंचायतों के एक एकड़ तक भूमि रखने वाले किसान 11 अगस्त तक अपने प्रखंड कृषि पदाधिकारी या कृषि समन्वयक के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। पात्र किसानों को प्राकृतिक तरीके से कतरनी, बासमती और अन्य स्वीकृत धान की किस्मों की खेती पर प्रति एकड़ प्रति वर्ष 4,000 रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी।
कृषि विभाग के अनुसार, केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के लिए 2,481 करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं। इसके तहत देशभर में 7.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देते हुए 15 हजार ग्राम क्लस्टरों के माध्यम से एक करोड़ किसानों को लाभ पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल न केवल भागलपुर की पहचान रहे कतरनी धान जैसी पारंपरिक किस्मों को नया बाजार दिलाएगी, बल्कि किसानों को कम लागत में अधिक मुनाफा और पर्यावरण को भी बड़ा लाभ पहुंचाएगी। प्राकृतिक खेती की यह पहल आने वाले समय में जिले की कृषि व्यवस्था में नई मिसाल बन सकती है।
















