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सबौर की इस विरासत से आज भी लोग अनजान

प्रदीप विद्रोही

भागलपुर। आम की बात आते ही लोगों की जुबान पर मालदह, दशहरी, लंगड़ा, चौसा, अल्फांसो, जर्दालू और अमरपाली जैसे नाम आते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि दुनिया का पहला वैज्ञानिक तरीके से विकसित संकर (हाइब्रिड) आम बिहार की धरती पर तैयार किया गया था। यह ऐतिहासिक उपलब्धि वर्ष 1951 में तत्कालीन बिहार कृषि महाविद्यालय, सबौर (वर्तमान बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर) के वैज्ञानिकों ने हासिल की थी।
बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के फल विज्ञान (पोमोलॉजी) विभाग के एक कोने में यह ऐतिहासिक पेड़ के सामने लगा बोर्ड ध्यान आकर्षित करता है। बोर्ड पर लिखा था – ‘विश्व का प्रथम संकर आम – प्रभाशंकर एवं महमूद बहार ब्लॉक।’ यही वह स्थान है, जहां आम अनुसंधान के इतिहास का एक नया अध्याय लिखा गया था।


वैज्ञानिकों के अनुसार, उस समय आम की नई किस्में प्राकृतिक परागण या चयन के आधार पर विकसित होती थीं। पहली बार सबौर के वैज्ञानिकों ने नियंत्रित परागण (Controlled Hybridization) की वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर दो श्रेष्ठ किस्मों के गुणों को मिलाया और ‘प्रभाशंकर’ तथा ‘महमूद बहार’ नामक संकर किस्में विकसित कीं। इसे आधुनिक आम प्रजनन (Mango Breeding) की शुरुआत माना जाता है।
‘प्रभाशंकर’ को विकसित करने के लिए बॉम्बे और कलापडी किस्मों का चयन किया गया। वैज्ञानिकों का उद्देश्य बॉम्बे की उत्कृष्ट मिठास और सुगंध को कलापडी की नियमित फल देने की क्षमता और रेशारहित गूदे के साथ जोड़ना था। इसके लिए हजारों फूलों पर हाथ से नियंत्रित परागण किया गया और वर्षों के परीक्षण के बाद यह ऐतिहासिक सफलता मिली।
इस संकर किस्म की सबसे बड़ी विशेषता नियमित फलन (Alternate Bearing की समस्या में कमी), बेहतर स्वाद, आकर्षक रंग, रेशारहित गूदा और परिवहन के दौरान अच्छी गुणवत्ता बनाए रखना था। उस दौर में इसे कृषि विज्ञान की बड़ी उपलब्धि माना गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि बाद में विकसित प्रसिद्ध संकर आम अमरपाली और मल्लिका जैसी किस्मों की वैज्ञानिक नींव भी इसी शोध परंपरा से मजबूत हुई। आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, रोग प्रतिरोधी किस्मों और अधिक उत्पादन वाली बागवानी तकनीकों पर काम कर रही है, तब यह तथ्य बिहार की वैज्ञानिक विरासत को नई पहचान देता है।
बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर आज भी फल एवं बागवानी फसलों पर महत्वपूर्ण अनुसंधान कर रहा है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि विश्वविद्यालय में विकसित तकनीकें और उन्नत किस्में किसानों तक व्यापक रूप से पहुंचें, तो उत्पादन और किसानों की आय दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
यह ऐतिहासिक उपलब्धि केवल बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी वैज्ञानिक विरासत को किसानों, कृषि छात्रों और आम लोगों तक पहुंचाना समय की जरूरत है, ताकि आधुनिक खेती के साथ-साथ भारत की कृषि उपलब्धियों का सम्मान भी बढ़ सके।

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