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पहचान तो मिली, लेकिन क्या बदली किसानों की आर्थिक स्थिति? सार्वजनिक आंकड़ों की कमी से उठ रहे कई सवाल

भागलपुर। वर्ष 2018 में भागलपुर के प्रसिद्ध जर्दालू आम को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग मिलने के बाद इसे अंग क्षेत्र की कृषि विरासत के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि माना गया था। उस समय उम्मीद जताई गई थी कि इस विशेष पहचान से जर्दालू आम की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग बढ़ेगी, किसानों को बेहतर कीमत मिलेगी, निर्यात का विस्तार होगा और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिलेगी।

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हालांकि, जीआई टैग मिलने के आठ वर्ष बाद भी यह सवाल बना हुआ है कि क्या इस उपलब्धि का वास्तविक लाभ किसानों तक पहुंच पाया है। उपलब्ध सार्वजनिक सरकारी आंकड़ों में इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता।

सम्मान मिला, लेकिन प्रभाव का स्पष्ट आकलन नहीं

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भागलपुर जिले में लगभग 8,600 से 8,700 हेक्टेयर क्षेत्र में आम की खेती होती है और वार्षिक उत्पादन करीब 86,000 से 87,000 टन के बीच है। लेकिन केवल जर्दालू आम को लेकर विस्तृत और समेकित सार्वजनिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

अब तक सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है कि वर्षवार जर्दालू आम का उत्पादन कितना हुआ, इसके बगीचों का कुल क्षेत्रफल कितना है, जीआई टैग मिलने के बाद खेती के क्षेत्र में कितनी वृद्धि हुई, किसानों की आय में कितना परिवर्तन आया, वर्षवार निर्यात की मात्रा और मूल्य कितना रहा, किन देशों को कितना निर्यात हुआ तथा इस विशेष पहचान का लाभ कितने किसानों तक पहुंचा।

ऐसे में जीआई टैग के वास्तविक आर्थिक और सामाजिक प्रभाव का निष्पक्ष मूल्यांकन करना कठिन माना जा रहा है।

निर्यात बढ़ा, लेकिन पूरी तस्वीर अभी भी अधूरी

जीआई टैग मिलने के बाद जर्दालू आम ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान बनानी शुरू की। वर्ष 2021 में इसकी पहली व्यावसायिक खेप यूनाइटेड किंगडम भेजी गई। इसके बाद दुबई सहित कुछ अन्य देशों में भी जर्दालू आम का निर्यात हुआ।

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल निर्यात शुरू होना ही पर्याप्त नहीं है। कुल निर्यात की मात्रा, उसका आर्थिक मूल्य, वर्षवार वृद्धि तथा किसानों को हुए प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ से संबंधित विस्तृत सार्वजनिक आंकड़े भी उपलब्ध होने चाहिए।

जीआई टैग के साथ जवाबदेही भी जरूरी

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जीआई टैग केवल किसी उत्पाद को विशेष पहचान देने का माध्यम नहीं है, बल्कि उसके आर्थिक और सामाजिक प्रभाव का नियमित मूल्यांकन भी आवश्यक है। यदि इसका उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है, तो इसके परिणामों का पारदर्शी दस्तावेज भी सार्वजनिक होना चाहिए।

उनका मानना है कि इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि क्या किसानों को बेहतर मूल्य मिला, क्या नए बगीचों का विस्तार हुआ, क्या युवाओं का कृषि के प्रति रुझान बढ़ा और क्या निर्यात में लगातार वृद्धि हो रही है।

हर वर्ष जारी हो ‘जीआई इम्पैक्ट रिपोर्ट’

कृषि एवं ग्रामीण विकास से जुड़े जानकारों ने सुझाव दिया है कि प्रत्येक जीआई टैग प्राप्त उत्पाद के लिए सरकार को प्रतिवर्ष “जीआई इम्पैक्ट रिपोर्ट” जारी करनी चाहिए। इस रिपोर्ट में उत्पादन, क्षेत्रफल, निर्यात, किसानों की आय, मूल्य श्रृंखला, लाभार्थियों तथा भविष्य की रणनीति से संबंधित विस्तृत जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए।

इसके साथ ही किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), पंजीकृत निर्यातकों तथा संबंधित योजनाओं की जानकारी भी सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि नीतियां ठोस तथ्यों के आधार पर बनाई जा सकें।

विरासत के साथ समृद्धि भी जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि यह बहस केवल भागलपुर के जर्दालू आम तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर के जीआई टैग प्राप्त उत्पादों के लिए भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। यदि प्रभाव से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक नहीं होंगे, तो योजनाओं की सफलता का मूल्यांकन और भविष्य की रणनीति तय करना कठिन होगा।

जर्दालू आम अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक और कृषि विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे केवल सम्मान का प्रतीक नहीं, बल्कि किसानों की आर्थिक समृद्धि का मजबूत आधार बनाने के लिए पारदर्शिता, जवाबदेही और नियमित सार्वजनिक रिपोर्टिंग की आवश्यकता है। आज जरूरत केवल यह जानने की नहीं है कि जर्दालू आम को जीआई टैग मिला, बल्कि यह भी जानने की है कि इस विशेष पहचान से किसानों और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में वास्तविक बदलाव कितना आया।

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